साहित्य का सोपान

शापिता…

शापिता

मीनल…मीनल…पेशेंट नंबर 15….मीनल,कोई हलचल नहीं, वो तो जैसे किसी दूसरी दुनिया में विचरण कर रही थी।
कोई जल्दबाजी नहीं… यादों के पुलिंदे को उलट पलट कर अतीत,वर्तमान और भविष्य के चक्रव्यूह में फंस कर कभी एक पल के लिए मुस्करा लेती तो दूसरे ही पल आँखो के कोर से ढलकते हुए आँसुओं को पोंछने का नाकामयाब प्रयत्न करती ।

मध्यम वर्गीय परिवार की सपाट सी जिंदगी से निकलते अति आत्मविश्वासी मीनल उसूलों और मर्यादा को रौंदती कहाँ समझ सकी थी कि एक दिन वो ऐसे मोड़ पर आ खड़ी होगी जहाँ पश्चाताप और आंसुओं के अलावा कुछ नहीं रह जाएगा।
एक लंबी सी आह भरी उसने…मिटाने की कोशिश हमने भी भी की और उसने भी। हमने फासले ,उसने वजूद …आखिर जीत उसी की हुई ।
अतीत जैसे आँखो के सामने वर्तमान बनकर आ रहा था,कैसे भूले वो उस नादानी को जो उसे इस जगह लाकर रख दिया था ।

माता पिता की बातों को हवा में उड़ा कर ,विवाह जैसे पवित्र बंधन को नकारती उन्मुक्त स्वभाव वाली ‘मीनल’ सहकर्मी ‘राज’ के “लिव इन रिलेशनशिप ” के आमंत्रण को ऐसे सहर्ष स्वीकृति दे दी मानो इसी पल का बरसों से इंतजार कर रही हो।ना ससुराल की झिकझिक ना कोई जिम्मेदारियां और ना ही कोई पाबंदियां ।
धीरे धीरे मीनल अपने परिवार से दूर होती जा रही थी,कोई गैरतमंद माँ बाप बेटी के इस दुःसाहसी कदम को कैसे बर्दाश्त कर पाता भला ।
भविष्य के काले मंडराते बादल से अंजान बनी वो तो बस राज के सान्निध्य में बार ,होटलों और मौज-मस्ती में डूबी रहती।पैसे की कमी तो अच्छी नौकरी के कारण थी ही नहीं ।राज में अपना भविष्य तो नहीं दिखता पर वर्तमान की खुशियाँ उसे कुछ सोचने का मौका ही नहीं देते।

कभी आवाज में कशिश थी ,कभी नजरों में नशा था फिर ऐसा असर होने लगा कि होश दोनों खोने लगे….युवा तन साथ रहते रहते मर्यादा की हर वो सीमा लांघ गये जो सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं हो सकता।

ऐसा तो उसने कभी सोचा भी नहीं था कि मौज मस्ती इतनी महंगी पड़ जाएगी कि उसे अस्पताल के चक्कर काटने होंगे ।राज इसे मीनल की समस्या बता किनारा ले लिया।सहमति से बनाए गये संबंध में राज को दोष देना ही बेमानी था।

ताली एक हाथ से नहीं बजती….कुसूरवार अगर राज था तो मैं भी कहाँ बेकसूर थी।उसने तो वादा ही नहीं किया था मेरे सुख दुःख में साथ देने का।
लिव इन रिलेशनशिप में आकाश से तारे तोड़ कर लाने की बात तो होती है पर जीवन के सुख दुख में हाथ पकड़ साथ देने की हिम्मत नहीं होती ।
नवाकुंर की आहट पा कर मीनल विचलित हो राज के सामने विवाह प्रस्ताव रखी जिसे सुन कर उसने यूँ भेदती नज़र से देखा जैसे कहना चाह रहा हो…..तुम्हारी जैसी लड़की जो विवाह के पहले मर्यादा तोड़ सकती है क्या पत्नी बनने लायक है।
मैं भीतर से सिहर उठी मानों चोरी करती पकड़ी गई होऊँ। लिव इन पार्टनर बस मौज मस्ती के लिए ही होतें हैं, ये कैसे भूल गई थी ।अच्छा हुआ जो उसने रिश्ता तोड़ दिया,मेरे अंदर इतना हौसला कहाँ था।

अस्पताल में फार्म भरती वो पति के नाम पर क्या लिखती,जिससे कोई रिश्ता ही नहीं जोड़ा था ,जिसने बीच राह में ही झटक दिया था ,कैसे लिखती उसका नाम और हमने ….हमने भी तो जिंदगी को मजाक बना कर रख दिया था।

आज समझ में आ रहा था …बड़े बुजुर्ग मर्यादा और संयम में रहने की नसीहत क्यों दिया करतें हैं ।मेरी गलती की सजा एक अबोध क्यों भोगे?अवैध तो हमारे रिश्ते थे उस आने वाले की क्या गलती है जो अवैध का ठप्पा ले कर दुनिया में आँख खोले।
मीनल …नर्स ने झकझोरा तो जैसे चेतना में वापस लौटी मीनल।
एक लड़की मातृत्व सुख पा कर तृप्त और पूर्ण हो जाती है पर मीनल…..।
शापित पथ भ्रष्ठ अप्सरा मातृत्व सुख से वंचित होने के लिए आपरेशन थियेटर की तरफ बढ़ गई।

किरण बरनवाल, धनबाद, झारखंड

समीक्षा

शापिता….. शीर्षक उस कथानक है जो पाश्चात्य और आधुनिकता के नक्कारखाने मे भारतीय संस्कृति की तूती बजाता लगता है….। किरण बरनवाल की लेखनी ने इस बार उस विषय को कथानक में ढाला है… जिसके कारण बहुत सी जिंदगियां बर्बाद हो चुकी हैं…. या फिर बर्बादी के कगार पर खड़ी हैं…. । शापिता वह कथानक भी कहा जा सकता है… जो अंधी दौड़ में.. एक संकेतक का काम करता है…। कहानी को जिस अंदाज में कहा गया है…. वह अंदाज भी किसी थ्रिलर की तरह आगे बढ़ता है…. पाठक दम साधे अंत का इंतजार करता है….।
बात कुछ कहानी की ….. जिसकी नायिका मीनल जवानी के जोश में ….. मर्यादाओं का होश खो देती है…. और न्यायालय द्वारा मान्यता प्रदान किए गए…… लिव इन रिलेशनशिप….. में राज के साथ रहना पसंद करती है…। मीनल अपना लालन पालन कर योग्यता प्रदान करने वाले माता पिता की भो उपेक्षा अपनी सुदृढ आर्थिक स्थिति के दम पर कर देती है…..। इस रिश्ते को कानूनी मान्यता भले ही मिल गई हो… लेकिन भारतीय समाज आज भी इसको स्वीकार करने में हिचकता है….। यह रिश्ता.. कोई रूहानी रिश्ता नहीं होता…. केवल आकर्षण होता है…. अथवा जिस्मानी जरूरत की पूर्ति के नाम …. यह रिश्ता हासिल करता है….।
हद तो तब होती है… जब जिस्मानी रिश्ते का परिणाम… संतति के आगे बढ़ जाने की संभावना को जन्म देता है… और मीनल से वैवाहिक बंधन में बंधने से… वही राज इस बिना पर इंकार कर देता है… कि विवाह पूर्ण समर्पण कर देने वाली मीनल… चारित्रिक रूप से उसे स्वीकार्य नही….. और नायिका का भरम टूटता है… असमंजस बढ़ता है सन्तान को जन्म दिया जाए या नहीं…. यहां पर नायिका साहस दिखाते हुए… आने वाली सन्तान की गलती नहीं मानते हुए…. ऑपरेशन थियेटर की तरफ कदम बढ़ा देती है…. इसी बिंदु पर एक बात और उभर कर आती है कि… मातृत्व सुख पाने जा रही नारी की कमजोरी माना जाए… या फिर आधुनिक व्यावसायिक युग के मेडिकल फील्ड की सोच…. जहां प्राकृतिक प्रसव अपवाद बन गए हैं…। यह इस कहानी का अनकहा कथ्य है… लेकिन सत्यता से भरा तथ्य है….। साथ ही एक पौराणिक आख्यान का जिक्र भी…. पथ भ्रष्ट अप्सरा….. इन तीन शब्दों में किया है… जो पुरुवंशी राजा पुरुरवा और इंद्र लोक की अप्सरा उर्वशी की प्रणय कथा कहा जाता है… जहां मातृत्व सुख प्राप्त कर चुकी अप्सरा उर्वशी को अपने प्रेमी पति पुरुरवा और पुत्र से वियोग सहना पड़ा था…कहानी में भावी सन्तान के पिता का वियोग… मीनल सह रही है…।
पश्चिमी अंधेरे के फैलाव में…. किरण की कलम ने… पूर्वी( भारतीय) आशा की किरण को चमकाया तो है….। बधाई किरण जी….।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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