साहित्य का सोपान

संतुलन….

संतुलन

हॉल में कुछ पलों की ख़ामोशी सी छाई हुई थी।कुछ चेहरे आँसुओं से भीगे हुए थे तो कुछ एक की नज़रें मेहुल के चेहरे पर आगे क्या हुआ की उत्सुकता में टिकीं हुईं थी।एक दीर्घ निः श्वास के बाद मेहुल ने कहा ,”मेरी अक्षमता से उपजी लोगों की सहानुभूति और उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने ,मेरे अपनों के तानों ,उलाहनों ने मन को छलनी कर दिया था और मैं बस एक कमरे में कैद होकर रह गया था।हारकर एक दिन फाँसी का फंदा तैयार कर अपनी ज़िन्दगी खत्म करने की ठान ली।लेकिन किस्मत ने भी मानो उपेक्षा करने की ठान ली थी।मेज पर चढ़ कर फाँसी का फंदा बनाने में ही बार बार मेरा संतुलन बिगड़ जाता था । मरने के लिए भी कदम लड़खड़ा जाएँ उससे बड़ी हार क्या होगी । कोई और उपाय भी नहीं सूझ रहा था ।अपने दुःख, अवसादों से घिरा ,उसी मेज पर सर रख कर कुछ पल सोचता रहा और तब… ! तब ,बस एक ही ख्याल आया कि मौत के लिए इतने प्रयास किये, तो जीने का ही एक प्रयास और क्यूँ न कर लूँ ?” कहकर मेहुल ने पास पड़ा पानी का गिलास उठाया और एक ही साँस में खाली कर दिया और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा ,” प्रो० अविनाश ने आज इस सेमिनार में “युवावर्ग और आत्महत्या की ओर बढ़ते कदम” विषय पर मुझे अपनी ज़िन्दगी के अनुभव आप सबसे साँझा करने के लिए कहा,क्यूँकि करीबी होने के कारण वो मेरी ज़िन्दगी की पहली असफलता से लेकर आज तक की कामयाबी के पूरे सफ़र के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं।
” लेकिन आज एक बात सबसे कहूँगा…कि कब कौन सा पल हमारी ज़िन्दगी का रुख बदल दे ,हम स्वयं भी नहीं जानते ।मेरी आज की इस संतुलित ज़िन्दगी के पीछे उस दिन के असंतुलन का ही तो बहुत बड़ा हाथ है जो इन बैसाखियों ने दिया और मैं इन्हीं की वजह से अपना जीवन समाप्त करने चला था।” मेहुल के चेहरे पर आत्मविश्वास की जगी जोत आज मानो प्रकाश बन चहुँ ओर उजाला कर रही थी।

रश्मि तारिका, सूरत, गुजरात

समीक्षा

दो शिक्षा सत्र…. चढ़ गए कोविड 19 कि भेंट…. बचपन से लेकर जवानी तक हो गई कैद… बचपन ने तो अपनी मस्ती के लिए कुछ न कुछ खोजकर दिल बहला लिया…. लेकिन तरुणाई इस कोरोना काल में… हताश और निराश सी हो गई…. भविष्य के सपने … अपने नहीं हो पाने का डर सताने लगा… यह तनाव बढ़ रहा है… तनाव के बढ़ते कदमों ने… युवा मन में अवसाद (डिप्रेशन) का ठिकाना बना दिया….. परिणाम में कुछ युवा जीवन … मृत्यु को श्रेयस्कर समझ कर गले लगा चुके हैं… तो कुछ तैयारी में हो सकते हैं…. जो नकारात्मक विचारों से प्रभावित जीवन जी रहे हैं…।
ऐसे कठिन काल में उनके लिए रश्मि तारिका की कलम से एक लघु कथा रची गई है… संतुलन..।
जिसमें कथा नायक….. मेहुल…जिसका अर्थ होता है बारिश….. वह प्रो. अविनाश के सेमिनार.. युवा वर्ग के आत्महत्या की तरफ बढ़ते कदम में…. आशाओं और उम्मीदों की वह बारिश करता है कि…. मन ऊर्जा, उमंग और उत्साह से लबरेज हो… ज़िन्दगी जीने की हिलोरें मारने लगता है…. ।
यही इस लघुकथा का सशक्त और सामयिक पक्ष है.. जो आज के इस हताशा के दौर में जीने का एक सलीका और तरीका दोनों सिखाता है…। एक प्रकार से एवरेस्ट की चोटी के दुर्गम और कठिन मार्ग को सुगम और सरल बना देने जैसा कथानक है…।है तो छोटा लेकिन अपने आप में एक उपन्यास की विषय वस्तु समेटे हुए है….। निराश जवानी के लिए… उम्मीदों की बारिश है…. उत्साह की लहरें हैं… ऊर्जा की कश्ती है… कथानक संतुलन…। आसान और ग्राही भाषा में …. उत्कृष्ट और आज की जरूरत वाले सृजन का नाम है लघुकथा संतुलन…..। बधाई रश्मि तारिका जी……।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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