साहित्य का सोपान

संशोधन

संशोधन

नव वधु की आहत आँखें देख
तुम्हारा कलेजा छलनी नहीं हो जाता
जब तुम उसे भोजन बनाते समय नमक चखने पर
कह देती हो कि सारी रसोई जूठी हो गई….

तुम्हें जरा भी दर्द नहीं होता
जब तुम कहती हो बड़ों के बाद खाना चाहिये
और भूखे पेट उसे ऑफिस जाना पड़ता है….
लेकिन बेटियों पर ये नियम लागू नहीं होते

सखरी से जूठन ,मंदिर से माहवारी ,साड़ी से पल्लू
तक कि न जाने कितनी वर्जनाएँ ,कितने कानून
थोपे गए थे तुमपर जिसे तुम आज तक
निःशब्द ढोती आई हो…..

इस चक्रव्यूह को भग्न कर दो
तुम अभिमन्यु नहीं जिसने चक्रव्यूह में सिर्फ
प्रवेश करनासीखा
पुनरावृति न करो उस दर्द में जीने और जिलाने का
बदल डालो कानून रसोई से बिस्तर तक का…..

संशोधित कर दो सारे बेतुके नियमों को
संविधान के अनुच्छेद भी तो
सुविधानुसार संशोधित किये जाते रहे हैं …..

शुभा मिश्रा, जशपुर, छत्तीसगढ़

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