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बारिश…

बारिश

आज फिर आजमा गई बारिश!
आग दिल में लगा गई बारिश!

बूंदे रिमझिम ऐसी पड़ी तन पे,
धड़कनों को बढ़ा गई बारिश!

हमने संजोये थे बहुत सपने,
एक पल में ढहा गई बारिश!

इस सावन भी न आ पाया साजन,
मुझको कितना रुला गई बारिश!

देखती रह गई मैं बस बूंदे,
पलकों पे ऐसे छा गई बारिश!

–—————
सद्गति

मृत्यु एक अटल सत्य है
अंत में सब का यही गत है!
कर्म ऐसा करो हो मोक्ष प्राप्ति
अपना तो बस यही मत है!

जाना तो है सबको वहीं
फिर क्यों करें द्वेष और दुष्कर्म!
सद्भावना रखें सदा मन में
करें हम सदा ऐसा सत्कर्म!

जाने के बाद भी जिंदा रहूँ सबके दिलों में
कर जाएं हम कुछ ऐसे अच्छे कर्म!

अनुपमा अधिकारी “अनु”
किशनगंज, बिहार

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