साहित्य का सोपान

नई सुबह….

नई सुबह’

यह कुछ वर्ष पहले की बात है जब मैं लखनऊ से शाहजहाँपुर घर वापिस आ रही थी। मेरी ट्रेन रात्रि 10 बजे के बाद की थी जो पहले से ही काफी विलंब से चल रही थी। लंबी प्रतीक्षा के बाद जब ट्रेन आई तो छोटा भाई जो कि मुझे स्टेशन छोड़ने आया था मुझे ट्रेन में बैठाकर नीचे उतर गया और मैं बर्थ पर अपना सामान जमा कर बैठ गई। जैसे ही चलने के लिए तैयार ट्रेन धीमी गति से अपने स्थान से सरकने लगी, तभी मेरे सामने वाली खाली बर्थ पर एक नवयुवक हांफते हुए आकर बैठ गया। शायद उसने भागते हुए ट्रेन पकड़ी थी। मुझे वो नवयुवक अपने हाव-भाव से न जाने क्यों बहुत बेचैन और अस्थिर सा प्रतीत हो रहा था। ज्योंही ट्रेन तीव्र गति से लखनऊ शहर को पीछे छोड़ने लगी, वो युवक भी अपने स्थान से उठकर इधर से उधर चहल- कदमी करने लगा। उस कंपार्टमेंट में कम ही लोग थे और सोने की तैयारी में थे, शायद इसीलिए किसी ने उसपर अधिक ध्यान नहीं दिया। मैं भी अपनी बर्थ पर कमर सीधी करने की मंशा से लेट गई क्योंकि लखनऊ से शाहजहांपर की दूरी बहुत ज़्यादा नहीं थी और मुझे यात्रा में नींद भी कम ही आती थी। थोड़ी देर में अनुभव हुआ कि वही युवक कभी अपने स्थान पर आकर बैठ जाता था, फिर दूसरे ही पल उठ कर घूमने लगता था। थोड़ी देर तो मैं देखती रही और उधर से ध्यान हटाने का प्रयास करती रही, पर कुछ देर बाद मुझे भी उसका ऐसा अजीबोगरीब व्यवहार अखरने लगा था। सोचा उसे टोक ही दूं कि बरखुरदार या तो बैठ जाओ या फिर शांति से खडे़ रहो। ऐसे दूसरे यात्रियों को भी कष्ट होता है। फिर यह सोच कर कि शायद वो किसी बात पर परेशान हो, मैं भी शांतिपूर्वक उसको देखती रही और फिर आंखें बंद करके लेट गई। तभी किसी की आवाज से आंखें खुल गईं और देखा कि वही युवक क्रोध में उत्तेजित होकर किसी से फोन पर बात कर रहा था। बार-बार क्रोध में वह अपना फोन पटकता और फिर से फोन उठाकर जोर-जोर से किसी से झगड़ने लगता। थोड़ी देर तक यही सिलसिला चलता रहा और आखिर में फोन वहीं बर्थ पर फैंक कर उठा और चलती ट्रेन के डाले पर जाकर खड़ा हो गया। इतनी देर तक उसकी हरकतें देखने के पश्चात मुझे इतना आभास तो हो गया था कि कुछ तो गलत है, मानों उसके मन में कोई कशमकश चल रही थी। अनायास ही मेरे मन में किसी अनहोनी की शंका उपजी। वो मेरे पुत्र के समान था इसलिए स्वयं को रोक नहीं पाई, उठ कर उसके पास पहुंचीं और बड़े ही स्नेहशील शब्दों में उससे बोली “बेटा यहाँ मत खडे़ रहो, उधर अपनी सीट पर चल कर बैठो। मेरा इतना कहना था कि किसी आज्ञाकारी बच्चे की भॉंति वह युवक बहुत ही भारी कदमों से आकर अपनी बर्थ पर बैठ गया। मैं भी अपनी सीट पर वापिस आकर बैठ गई। उसे ऐसी दयनीय स्थिति में देखकर मुझे उससे सहानुभूति होने लगी थी। मैं सोचने लगी कि किस प्रकार से बात प्रारंभ करूं ताकि वो मुझसे अपनी परेशानी बांटकर कुछ कम कर सके। मैं भी अकेली बोर हो रही थी क्योंकि ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी। तभी उसका स्वर मेरे कानों से टकराया, “आंटी मैं आपसे कुछ बातें शेयर कर सकता हूँ ?” मैं तो स्वयं कब से आतुर थी बात करने को। मैंने तुरंत ही हामी भर दी ,”हां बेटा, क्यों नहीं।” वह दुखी स्वर में बोला, “आंटी मैं एक लड़की को बहुत प्यार करता हूँ…खुद से भी ज्यादा। लेकिन आज उसने मुझे धोखा दे दिया…” फिर उसने बताया कि वो गुड़गांव की एक कंपनी में काम करता था और उसकी प्रेमिका लखनऊ में किसी कंपनी में नौकरी करती थी। वो कई दिनों से उसका फोन नहींं उठा रही थी, इसीलिये उसे लखनऊ आना पडा़। वह तीन दिनों तक उससे मिलने का प्रयास करता रहा परंतु वह लड़की उससे नहीं मिली। हद तो तब हो गई जब उस लड़की ने अपने बॉस के द्वारा उसको धमकाया और उसे हमेशा के लिए भूल जाने को कहा। उसके बाद जो उसने बताया उसे सुन कर मैं भी एक पल को सकते में आ गयी थी। वह बोला, “आंटी यदि आप मुझे नहीं टोकती तो पता नहीं आज मैं क्या कर बैठता..शायद इस चलती ट्रेन से ही कूद जाता। मैं उसे कभी नहीं भूल सकता। उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया…” इसके बाद वो बोले जा रहा था और मैं एकदम शांत होकर सुन रही थी। बीच – बीच में वह अपना माथा पीट रहा था। अपनी बात समाप्त करके वो मुझे देखने लगा। अब मेरी बारी थी बोलने की। मैंने उससे पूछा कि तुम कितने भाई बहन हो? उसने बताया कि उससे छोटी पांच बहनों का अकेला भाई था वह। मैंने उसको समझाते हुए कहा,” जरा सोचो तुम जो करने जा रहे थे उसके बाद तुम्हारेे माता-पिता व बहनों का क्या हाल होता, जो तुम पर अपना स्नेह लुटाते हैं, अपनी जान न्यौछावर करते हैं?” अब वो मुझे कोई अपना-सा बहुत जाना-पहचाना लगने लगा था, जो अपने आप से ही काफी युद्ध कर चुका था और इस युद्ध को जीतने में मैं उसकी सहायता करना चाहती थी। वह थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर अचानक से बोला, “आंटी, शायद मैं ही उसके लिए सही नहीं था।” मैं तुरंत ही बोल पड़ीं, “नहींं, तुम नहीं बल्कि वही तुम्हारे लायक नहीं थी।” अब तक वह काफी सहज हो चला था। बातों-बातों में उसने बताया कि उसका नाम दीपक है और वह मुरादाबाद अपने परिवार वालों के पास जा रहा है। वह बताने लगा कि कैसे अब वह अपनी बहनों को आगे खूब पढ़ाएगा। फिर अपने परिवार के सभी लोगों के विषय में बतियाता रहा।

उस समय उसके चेहरे की मुस्कान देख कर जो आत्मसंतोष मुझे मिल रहा था वो शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना बहुत कठिन है। इन्हीं बातों में कब मेरा स्टेशन आ गया, पता ही नहीं चला। मन भी भारी हो चला था उस बच्चे की मासूमियत देख कर, उसे ऐसी परिस्थिति में अकेला छोड़ते हुए। दीपक ने मेरा सामान उठाया और मुझे छोड़ने ट्रेन से नीचे उतर आया। मेरे पैरों को छूकर बोला, “थैंक्यू आंटी!” नहीं जानती किस अधिकार से मैं भी अनायास ही बोल पड़ी, “बेटा, सीधे घर ही जाना। तुम्हारेे माता-पिता व बहनें सब राह देख रहे होंगें।” उसने वहीं से एक कागज का टुकड़ा उठाया और अपना फोन नंबर लिख कर मुझे दिया। तभी ट्रेन चल पड़ी और वो दूर तक हाथ हिलाते हुये आंखों से ओझल हो गया। स्टेशन से घर का रास्ता तय करने में वो कागज का टुकड़ा कब मेरे हाथ से फिसल गया पता ही नहीं चला क्योंकि मैं तो अभी भी अनमनी सी इसी सोच में डूबी थी कि कैसे एक बड़ी अनहोनी टल गई थी आज। भोर की लालिमा धीरे – धीरे पूरे शहर पर अपने पैर पसारने लगी थी और शायद किसी के डूबते जीवन की भी यह नई सुबह थी शायद…। स्टेशन पर लेने आए पति के साथ इन्हीं बातों में डूबी हुई मैं अपने घर पहुंच गयी थी। आज भी जब किसी की आत्महत्या की खबर सुनती हूं तो मन विचलित हो जाता है फिर दीपक के विषय में सोचती हूँ तो एक आत्म-संतुष्टी का अनुभव होता है कि अनजाने में ही सही कोई तो अच्छा काम हुआ मुझसे।

निरुपमा सिंह चौधरी
बिजनोर, उत्तरप्रदेश

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