साहित्य का सोपान

कर्म-कांड…

साहित्य का सोपान

कर्म-कांड…

देखा एक ख़्वाब जो
था अजब दुनियां का।
ग़जब हो गया जब
जीते जी मै मर गया था।
आँसुओ से मानो हर एक
आस-पास मेरे तर गया था।
न चाहने वाला भी मानो
टूटकर बिखर गया था।

मेरी तृष्णाये अब तर्पण
मे तब्दिल हो गई थी।
सब की आशाये मानों
निराशा मे ढल गई थी।
हर एक दर्द की नुमायसी
मे तार-तार हुआ जा रहा था।
बच्चा भी बेचारगी बहा रहा था।

जो हमे जीवन भर रुलाता रहा
आज रो-रोकर बिफर गया था।
इंसा तो क्या आज तो दोस्तों..
राह का पत्थर भी बिखर गया था
जिसकी चर्चा जीते जी न हुई
आज घर-घर मे हो रही थी।
शाख़ भी मानो आहुति देने
को आतुर हो रही थी।

कल तक जिनकी हम
आँखों की किरकिरी थे।
आज वो भी गहरे दोस्त
बन काँधे पर हमें लिये थे।
डूबते सूरज की तरह
जीवन अस्त हो गया था।
कर्म-कांड निपटाकर
हर शख्स कर्तव्यों मे
व्यस्त हो गया था।

अचानक उषा ने निशा
का द्वार खटखटा डाला
भोर के ख्वाब ने मुझे
नींद से जगा डाला..
क्या इंसानियत ने कलयुग
मे इतना रंग बदल डाला
जिंदा जीवन को क्यूँ
मौत से भी बढ़कर दर्दनाक
बना डाला.. बना डाला।

प्रीति जैन “स्वप्नरंजिता”
जयपुर, राजस्थान
परिचय
प्रीति जैन ‘स्वप्नरंजिता, जयपुर (राजस्थान) में निवासरत हैं। उच्च शिक्षित होने के साथ स्वतंत्र लेखिका के रूप में समय-समय पर (कहानी, संस्मरण, लेख, कविता, शायरी) आदि लिखती रही हैं। आपकी रचनाएँ कई ख्यातनाम राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। आकाशवाणी व दूरदर्शन के साहित्यिक व सामाजिक परिचर्चाओं में शिरकत करती रही है। इसके अलावा आप अनेक साहित्यिक संस्थाओ की सदस्य हैं ।
आपके साँझा संग्रह, कलम के कदम, सत्यम प्रभात और काव्य कुँज का प्रकाशन हो चुका है। साथ ही “स्वप्नरंजिता” एकल काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।
सम्पादक

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Close