साहित्य का सोपान

आओ एक और दीप जलाएं

साहित्य का सोपान

आओ एक और दीप जलाएं

आओ इक नई आशा का,नए विश्वास का दीप फिर से जलाएं,
प्रेम, सद्भावना,आपसी एकता की ओर एक नया कदम बढ़ाएं।
भारत को फिर से एक नए उन्मुक्त गगन की ओर लेकर जाएं,
हमारा भारत बने निरोगी,ऐसी पवित्र भावना का प्रकाश चारों ओर फैलाएं।।
ऊंच नीच का भाव मिटे अब मानवता की गलियों में,
धर्म जाति के बैर से उठ कर सबके मन में प्रीत जगाएं।।
आओ इक आशा का दीप हम सब मिलकर जलाएं।।
हमें आलोकित करना है हर पथ को,दीप कर्तव्य निभाना है घर घर को।। उदासी भरे आशियाने को फिर अपनों का एहसास कराया जाए।। आओ अपने अपने घर पर आज प्यार का विश्वास का दीप जलाया जाए।।।
वक़्त आज आजमा रहा है,हमारी हिम्मत,हमारा हौंसला,क्यों ना हवाओं का रुख मोड़ने का जज़्बा दिखलाया जाए,भारतीय होने का गुरूर आज हर मंज़र से नजर आए। आओ इक नई आशा का दीप फिर से जलाया जाए।।
हर एक दीपक बनेगा,मानव की उम्मीद का प्रतीक।
अपनी पवित्र भावनाओं से हम एक बार फिर अपनी मिट्टी को महकाएं।।वर्तमान में जो हुआ उससे सबक लिया जाए,अपने आने वाले भविष्य को फिर से संवारा जाए।
आओ इक दिया, मां भारती के नाम से जलाया जाए। फैले हुए अंधकार को फिर चमकती लौ की चुनौती दी जाए।दीप जलाने का फ़र्ज़ निभा कर आओ मां भारती का कर्ज उतारा जाए।।
आओ इक आशा का दीप हम और तुम मिल कर जलाएं।।
माना कि बहुत मुश्किल घड़ी है, तो क्या हुआ,,
बस शिद्दत से आओ इक आशा की किरण दिखलाई जाए। इन चुनौतियों को आओ सामूहिक शक्तियों का एहसास कराया जाए।। उम्मीद का ,प्रेम का, सद्‌भावना का इक दिया जलाया जाए।
अपनी हिम्मत,हौंसले ओर संस्कृति का एक बार फिर परचम लहराएं,,
आओ इक नई आशा का दीप हम फिर से जलाएं।।
स्वस्थ रहिए,खुश रहिए।।

अर्चना गाबा “आर्ची” दिल्ली

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