प्रसंगवश

अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले आजाद

प्रसंगवश

अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले आजाद

नहीं मानी मरते दम तक हार

धर्म चंद्र पोद्दार
(लेखक)
पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदलका गांव के रहने वाले थे । भीषण अकाल पड़ने के कारण वे अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में जा बसे । बालक चंद्रशेखर का जन्म उसी गांव में 23 जुलाई 1906 को हुआ था । इस समय भावरा मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में है ।

बालक चंद्रशेखर अपने फूफा पंडित शिव विनायक मिश्र , जो बनारस में रहते थे , का सहारा लेकर संस्कृत विद्यापीठ में भरती हो गया ।
विदेशी माल न बेचा जाए , इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना दे रहे थे । बालक चंद्रशेखर भी एक दिन धरना देते पकड़ा गया । उसे पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट की अदालत में पेश किया गया ।
खरेघाट ने बालक चंद्रशेखर से कुछ सवाल पूछे । चंद्रशेखर ने उसका निर्भीक होकर उत्तर दिया । मजिस्ट्रेट द्वारा पूछे गए सवाल और उसके जवाब इस प्रकार थे : —

मजिस्ट्रेट : तुम्हारा नाम क्या है ?
बालक : आजाद ।
मजिस्ट्रेट : तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है ?
बालक : स्वाधीन ।
मजिस्ट्रेट : तुम्हारा घर कहां है
बालक : जेलखाना ।

मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट बालक चंद्रशेखर के उत्तरों से चिढ़ गया । उसने चंद्रशेखर को 15 बेंत लगाने की सजा सुना दी । उस समय बालक चंद्रशेखर की उम्र 14 वर्ष थी । जल्लाद ने पूरी शक्ति के साथ बालक चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतो से प्रहार किए । बालक चंद्रशेखर हर बेंत के साथ “भारत माता की जय’ बोलता । पूरे बेंत लगाए जाने के पश्चात जेल के नियम के अनुसार उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिये गए । बालक चंद्रशेखर ने यह पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गये । इस पहली अग्नि-परीक्षा में सम्मान सहित उतीर्ण होने के कारण बालक चंद्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मुहल्ले में नागरिक अभिनंदन किया गया । और तभी से बालक चंद्रशेखर चंद्रशेखर आजाद बन गया ।

चंद्रशेखर आजाद (आजाद) का मन अब देश को आजाद कराने के लिए अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गया । बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था । वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रवेश चटर्जी के संपर्क में आया । क्रांतिकारियों का एक संगठन वहां काम कर रहा था । इस संगठन का नाम ‘ हिंदुस्तान प्रजातंत्र – संघ ‘ था । आजाद इस संगठन का सदस्य बन गया ।

चंद्रशेखर आजाद सबसे पहले ‘काकोरी डकैती’ में सम्मिलित हुआ । इस अभियान के नेता थे राम प्रसाद बिस्मिल । नौ अगस्त सन 1925 को क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर गाड़ी को रोककर उसमें रखा अंग्रेजों का खजाना लूट लिया । बाद में एक-एक कर सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गये परंतु आजाद हाथ नहीं लगे । अब आजाद वहां से खिसककर झांसी चले आये । यहां उन्हें एक क्रांतिकारी साथी मास्टर रूद्रनारायण सिंह का संरक्षण मिला ।

जब झांसी में पुलिस की हलचल बढ़ने लगी , तो वे ओरछा राज्य में सातार नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर रहने लगे । आजाद के ना पकड़े जाने का एक विशेष कारण था । वह संकट के समय शहर छोड़कर गांवों की ओर चले जाते थे । इस प्रकार वे सुरक्षित रहते थे । आजाद ने ‘ हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना ‘ नामक एक सुदृढ़ क्रांतिकारी संगठन बनाया था । उनके साथियों ने इस सेना का कमांडर-इन-चीफ उनको ही बना दिया । अब भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी भी उनका साथी था । इस पार्टी का फैलाव उत्तर प्रदेश और पंजाब तक बढ़ गया था ।

उन्होंने पंजाब के लोकप्रिय नेता लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने वाले पुलिस अधीक्षक सांडर्स को मृत्युदंड देने का निश्चय कर डाला । 17 दिसंबर 1928 को आजाद , भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक कार्यालय को घेर लिया । पहली गोली राजगुरु ने दागी । वह सांडर्स के माथे पर लगी । वह मोटरसाइकिल से गिर गया । भगत सिंह ने आगे बढ़कर उस पर चार-छह गोलियां दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया । सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा करने की कोशिश की , तो उसे चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोली का निशाना बना दिया । लाहौर नगर में जगह-जगह परचे चिपका दिये कि लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है ।

27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में आजाद साथी सुखदेव राज के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे । पुलिस अधीक्षक नाट बाबर ने किसी मुखबिर की सूचना पर पार्क को चारों ओर से घेर लिया । दोनों ओर से गोलियां चली । आजाद ने सुखदेव राज को भगा दिया था । एक गोली आजाद की जांघ में लग चुकी थी । आजाद की सारी गोलियां भी समाप्त हो चुकी थी । अंतिम गोली बच गयी थी । इससे दुश्मन का अंत नहीं हो सकता था ।

आजाद को पकड़े जाने का ख्याल आया । लेकिन इस बहादुर योद्धा ने अंग्रेजों के हाथों मरने से बेहतर अपने हाथों अपना प्राणान्त करना उचित समझा । इसलिए उन्होंने अपनी अंतिम गोली अपनी कनपट्टी में दाग ली ।

धर्म चन्द्र पोद्दारमानगो , जमशेदपुर – झारखंड

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