साहित्य का सोपान

महिला बुद्ध क्यूं नहीं कहलाई

साहित्य का सोपान

महिला बुद्ध क्यूं नहीं कहलाई

महिला बुद्ध क्यूं नहीं कहलाई?
उद्वेलित मन की कुछ पंक्तियां
इक महिला को बहुत चुभ रही थी
विचारो की तंद्रा तो
जैसे टूट ही नहीं रही थी
नारियां बुद्ध नहीं होती
वो… विदुषी होती है
अपाला ,घोष हो सकती है
प्रेम में वह मीरा भी हो सकती है
माँ में वह यशोदा का रूप होती हैं
पत्नी में यशोधरा हो सकती है

जो बुद्ध का मार्ग प्रशस्त करती है
अंतहीन इंतजार करती है
पीपल-सी छांव लिए
बुद्ध होकर वापस आने का
पर वो खुद बुद्ध क्यूं नहीं होती ?

आसमां पर पहुंच जाने वाली महिला
बुद्ध नहीं, तो क्यूं नहीं??
वो थोड़ा सा मुस्कुराई
मन ही मन बुद्ध बनने की ठानी
चल पड़ी बुद्धत्व के मार्ग पर

अभी कुछ कदम चली ही थी
बेटी याद आई और बहुत रोई
फिर सर को झटका
और बुलंद इरादों के साथ
आगे बढ़ गई

बस, धीरे- धीरे वो सबसे दूर हो रही थी
पर बेटी की याद
दिलो-दिमाग पर हावी हो रही थी
मन में कुछ बुदबुदाते हुए
दृढनिश्चय के साथ हरकदम तेजी से
आगे बढ़ जाना चाहता था
उसे बुद्ध जो बनना था !!

हर कदम बेटी की मनोदशा
सामने आती जा रही थी
वो नितांत अकेले कैसे संभाल पायेगी सब कुछ
उसके वो तीन दिन तब जब
उसे ही संभालती हूं …
मै.. तो वो कैसे संभालेगी सब कुछ
कैसा लग जाती है मेरे सीने से उफ्फ…. ये आंसू ….!!

मैं कमजोर नहीं पड़ना चाहती हूं
कैसे बुद्ध चल दिए होंगे
सब कुछ त्याग कर दृढ़ता के साथ
हजारों ख्यालों को दरकिनार करते हुए

बुद्ध के दृढनिश्चयता को सोचते हुए…
इतिहास की साक्षी मुझे बुद्ध बनना है
सहसा उसके कदम ठिठक गये……!!
इक चीख ने उसे वहीं रोक दिया
सुनसान से घने जंगल में एक
बच्ची की चीखने की आवाजें- ‘बचाओ -बचाओ’
वो करूण पुकार कानों को
फाड़े जा रही थी

उस चीख ने सब कुछ भुला दिया
बढ़ चली तेज कदमों से
उस आवाज की दिशा में…
अपनी आवाज बुलंद करते हुए
लोगों को इकट्ठा करके दौड़ते हुए
उस बच्ची को बचा लेना चाहती थी

वो पहुंच चुकी थी
उस अबोध सी बच्ची के पास
जिसे राह चलते हुए कुछ लोग
जबरदस्ती गाड़ी में बिठा रहे थे…

जन सहयोग से उसे छुड़ा
उसके घर पर छोड़ वह
हजारों सवालात के साथ
तेज कदमों से पक्के इरादे लेकर
अपनी बेटी के पास जल्द से जल्द
पहुंच जाना चाहती थी ..
लगा लेना चाहती थी भींचकर उसे अपने सीने से

कभी कुछ ऐसा…. ??
इस खयाल से ही वो सिहर उठी थी
बस वो घर पहुंच जाना चाहती थी
क्योंकि बन चुकी थी वो
इतिहास की
पहली महिला बुद्ध !

इक लड़की को
उसके घर पहुंचाकर
अपनी बेटी को गले लगाकर‌
मन तो बस भावुक हो कह उठा-
हे नारी!
तू तो सृष्टि की सृजनहार है
तू तो जीवनदायिनी है
अपने सृजन से….
हजारों बुद्ध को जीवन देती है
क्या करोगी तुम बुद्ध बनकर ?
हजारों बुद्ध
तेरे चरणों का स्पर्श करेंगे
तुम तो ममतामयी माँ का स्वरूप हो
तुम बुद्ध नहीं, प्रबुद्ध हो!!*

प्रतिभा श्रीवास्तव
गुडंबा, लखनऊ –
—–
एक नजर…

आधी आबादी की मनोदशा और जिम्मेदारियों के अहसास ….. के जज्बात पिरोए हैं .. कवियत्री प्रतिभा श्रीवास्तव ने अपनी कविता .. महिला बुद्ध क्यूं नहीं कहलाई में….। रचनाकार जब रचता है रचना का संसार तो व्यक्त होते हैं मनोभाव … शब्दों में जो कविता, कहानी बन जाते हैं। ऐसा ही कविता के प्रारंभ में है… एक स्त्री का बुद्ध बनने की ठान लेना…और तमाम मोहपाश को शिथिल कर चल पड़ना बुद्ध बनने की राह पर…। पुत्री मोह के प्रतीक से मन में उदय होते अनेकानेक मोह को भी…. बुद्ध की हठधर्मिता से मोह से दूर हो जाने की कठोरता को व्यक्त करती कविता की पंक्तियां… नारी को भी बुद्ध बनने के लिए ही जोर डालती हैं…। एक बिटिया की करुण पुकार… सुनते ही अंदर की महिला और मां दोनों जागती हैं…. दुनियां के नापाक लोगों के नापाक इरादों को कामयाब होने से रोकने के लिए लगा देती है दौड़….. और बचा लेती है बच्ची के कौमार्य को…. पुत्री की याद के तूफान में बुद्ध बनने का दिया बुझ जाता है…।
बोधित्व की प्राप्ति हो जाती है कि.. वह प्रबुद्ध है.. बुद्ध बनने की जरूरत नहीं….। ब्रह्मा की प्रतिनिधि है… सृष्टि क्रम आगे बढ़ाने के लिए… विष्णु का अंश है पालन पोषण करने में… शिव का रूप है कल्याण करने में…। यही वास्तविकता है नारी की … जो यशोधरा बन कर बुद्ध से ही पूछ लेती है कि… क्या घर में रहकर बुद्धत्त्व की प्राप्ति संभव नहीं थी… तो गौतम बुद्ध बन चुके सिद्धार्थ यशोधरा को उत्तर देते हैं…. यह ज्ञान मुझे बोधितत्व प्राप्त होने के बाद हुआ कि गृहस्थ भी बुद्धत्त्व को पा सकता है..। जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है…। बुद्ध के जीवन की इस घटना को भी … यह कविता गहरे से रेखांकित कर एक संदेश दे जाती है कि… गृहस्थ की जिम्मेदारियां निभाते हुए भी प्रबुद्ध होकर बुद्ध बना जा सकता है….। जीवन दर्शन की व्याख्या करती आध्यात्मिक रचना के लिए… कवियत्री प्रतिभा श्रीवास्तव को बहुत बहुत बधाई…।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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