साहित्य का सोपान

नारी तू नारायणी

साहित्य का सोपान

नारी तू नारायणी

तेरी ख़ामोशी ही तो तेरे दुःखों का जन्म देती है
अपने भीतर के कोलाहल से अवगत तो करा
जिस अग्नि में तू जल रही है
उसकी तपिस से थोड़ा औरों को भी जला
तुझे अबला समझने वाले वे थोड़े से जो नादां परिन्दे हैं
अपने हौसलों से उन परिंदों के घर तू जला कर तो दिखा
कोई नहीं चलता साथ मजबूरियों की गठरियों को लेकर
अपने भीतर की चिनगारियों को जरा हवा लगने तो दे
फिर देख ज़माने को ज़रा अपना नज़रिया बदल कर तो देख
सम्मुख खड़ा रहा वही जो भीड़ के साथ नहीं …?
भीड़ से विलग अपने अस्तित्व में ऐ नारी तू जीकर दिखा
अपनी ख़ामोशी को अपनी पहचान बताने वाली नारी …
पुरुषों के कदमों तले रौंदी जाती हैं
बहते आंसुओं की सबब तो ये है कि वे व्यापार में भी धकेली जाती है
अपनी आसमां की हद पहचान और खींच दे
एक लम्बी लकीरें …
तुझे कमज़ोर सी आंकने वाले लोग देखना इक़ दिन
अपनी पौरुषता की गांडीव लिये तेरे पास खड़े मिलेंगें …

सरिता सिंह ” नेपाली “
पश्चिमी चंपारण, बिहार

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