साहित्य का सोपान

अतीत

#अतीत

अतीत कोई अभिसार या की फिर प्रियतम नहीं था,जिसके लिये कोई तड़प ,कोई टीस,कोई हुक उठती….

वो तो बस अलगाव का अनुभाजन था,वितरण था, जहां दर्द पसरता रहा,
बदजबान वाचालताओ तले………

और डर के सायो में पलती रही,नामूसी
रूसवाईयां,उस गंधीले ,दुर्गंधित ,अतीत की कसैली स्मृतियाँ…….

गढ़ती रही ,अनकही दूरियां ,करती रही जौहर मन का, बंधनो के अग्निकुंड में……

नजरो में तुम्हारी रोटी,कपड़ा,और मकान ही मेरा-यथोचित सम्मान था,बस इसे ही तुम मेहरबानियों की तरह देते रहे…….

संलाप संवाद से तो जैसे तुम कोसो दूर रहे,बस मन से मन को जकड़ ना सके
अनुरक्तियों के गुलिस्ते ,चाहे वहशतो में उजड़ते रहे…………….

मंजू श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश

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