साहित्य का सोपान

चुग्गा…

चुग्गा…

ट्रैन के सफ़र में पीछे छूटते जाते खेत खलिहान के साथ उनकी मेड़ों पर सीना ताने खड़े पेड़। कभी आकाश से बातें करते लगते तो उन पर मंडराते पक्षी भी यदाकदा दिख जाते..। पक्षियों को देखते ही याद आ जाती माँ…. हां मेरी माँ..। कितना स्नेह था उन्हें इन परिंदों से। ट्रेन की रफ्तार के साथ सुरभि की स्मृतियों ने भी रफ्तार पकड़ ली।
मां सुबह उठ कर स्नान आदि दैनिक कार्यों से निवृत होकर ठाकुरजी की पूजा करती और फिर शुरू होता सुरभि का पसन्दीदा काम, जिसे देखने और करने में सुरभि को खूब मजा आता था। माँ के हाथ में एक बांस से बनी डलिया होती। जिसमें ज्वार, मक्का और चावल के दाने भरे होते। तुलसी के क्यारा के आसपास की लंबी चौड़ी जगह में पसरा था आंगन। जिसे चारों तरफ से पेड़ पौधों ने घेर रखा था। उन्हीं में कबूतर, गौरैया, गिलहरी आदि ने अपनी अपनी शरण स्थली घरौंदे के रूप में बना रखी थी। उसी विशाल आंगन में मां चुग्गा .. डलिया में रखे विभिन्न अनाज के दाने … बिखेरती हुई.. मुझसे भी कहती … लो सुभि.. तुम भी डालो दाना…।
दानों के बिखरते ही कबूतर , गौरैया और गिलहरी आंगन में उतर आते। अपने अपने हिस्से का चुग्गा चुगने लगते..। जब कोई कबूतर अपनी चोंच में दाना भरकर पेड़ की तरफ जाता तो सुरभि मां से पूछती…. मां यह दाना लेकर उड़ क्यों गया… क्या अपने घर में बैठकर खाएगा..।
“नहीं री सुभि”… मां मुस्कुराते कर मुझे समझाते हुए कहती… “इसके छोटे छोटे बच्चे हैं, जो अभी उड़ना नहीं जानते। उनके लिए ये दाना लेकर जाते हैं। जैसे तुम्हारे पिताजी खेत से फसल घर लाते हैं या जरूरत की दूसरी चीजें बाजार से लाकर तुम्हें देते हैं।” मां की इन बातों से सुरभि सोच में पड़ जाती कि
पिताजी तो खेत से फसल उगाते हैं। फिर ये अपनी फसल क्यों नहीं उगाते।
मां से पूछने पर वह कहती .. ” बेटा, आज जहां हमारे खेत हैं, कभी वहां पर पेड़ हुआ करते थे। जिनके फल फूल खाकर ये पक्षी अपना गुजारा कर लेते थे। उन पेड़ों को हमने हटाया है तो इनका पेट भरना भी हमारी ही जिम्मेदारी हुई न।” रुककर मां मेरे चेहरे को गौर से देखती। मानो तय कर रही हों कि उनकी कितनी बात मेरे समझ में आई।
समय की बदलती करवटों ने सुरभि को बड़ा कर दिया था । लेकिन परिंदों को दाना चुगाने का नियम अब माँ के साथ सुरभि ने भी पाल लिया था। उसको याद आया जब पास के कस्बे में जगन्नाथ जी की रथ यात्रा में शामिल होने वह अपने पिताजी और मां के साथ गई थी तो लौटने पर मां ने बताया था कि “भगवान अपने क्षेत्र का भ्रमण करने रथ पर सवार होकर निकलते हैं और ये देखते हैं कि, मेरी बसाई दुनियां में कोई प्राणी कष्ट में तो नहीं है। ”
सुरभि ने पूछा ‘ अच्छा ये बात है रथ यात्रा की। अगर किसी को कुछ कष्ट होता है तो भगवान क्या करते हैं।”
मां ने कहा ” जो प्राणी कष्ट में होता है ,उसके आसपास के आदमी को ऐसी बुद्धि देते हैं कि वह उसकी परेशानी दूर करने लगता है।”
“कैसे” सुरभि के बालमन ने एक सवाल फिर उछाल दिया मां की तरफ।
मां ने कहा” जैसे अब चौमासा लग रहा है तो उन्होंने पहले से ही यह नियम बना दिया है कि इस मौसम में जमीन के दाने गीली मिट्टी में दब जाते हैं और पेड़ों पर ज्यादा फल भी नहीं तो आदमी अपने आंगन उन पक्षियों के लिए दाना बिखेरा करे।”
तभी ट्रेन के पटरियां बदलने के तेज आवाज से सुरभि के बेटे समृद्ध की नींद खुल गई। वह कुनमुनाने लगा। सुरभि ने बेग में से पानी की बोतल निकाल कर उसे पानी पिलाया। तब तक स्टेशन आ चुका था। इसके बाद वाले छोटे से स्टेशन पर सुरभि को उतरना था। समृद्ध ने अपने आसपास कुछ देखा और वापस अपनी आंखें बंद कर लीं।
सुरभि ने अपने सामान को लगभग समेट लिया और ट्रेन भी चल पड़ी…यादों के साथ। चुग्गा चुगते कबूतर मां के पीछे पीछे रसोई तक पहुंच जाया करते थे। उनके आसपास मंडराते पक्षियों के झुंड को देखकर सुरभि कहा करती थी… मां आप इनकी भी मां हो। और मां हंस देती थी।
आज फिर गांव जा रही हूँ । बड़ा सा आंगन अब भी है, परिंदे भी आते हैं। और उनके आते ही यादें भी ताजी हो जाती हैं। बचपन में भाइयों के आगे पीछे भागती सुरभि को अब समृद्ध के अपने आगे पीछे घूमने में खुद का बचपन नजर आने लगता है।
मां वाकई मां थी… मां के पीछे पीछे चलने वाले कबूतर और गौरैया कभी सुरभि के पीछे नहीं घूमे।
यादों का सिलसिला तो नहीं थमा लेकिन ट्रेन के थमते पहियों ने उसे उतरने का अहसास करा दिया। गांव में घर पहुंचते पहुंचते शाम हो चुकी थी। भाई भाभियों से मिलकर कुशल क्षेम पूछते बतलाते रात घिर आई। सब ने मिलकर भोजन किया और बतियाते बतियाते सो गए। सुबह नींद खुलते ही सुरभि ने अपना डेली रूटीन पूरा किया और थाम ली मां की वही बांस वाली डलिया। जिसमें भरे थे दाने और आंगन की तरफ जाते हुए बेटे समृद्ध का भी हाथ उसने दूसरे हाथ से थाम रखा था। आंगन में पहुंचते ही उसने समृद्ध की छोटी छोटी हथेलियों को दाने से भरते हुए कहा..” बेटा बिखेर दो ये दाने इस आंगन में…।”

सुरभि डागर, बिजनोर, उत्तरप्रदेश

समीक्षा

चुग्गा… यानि पक्षियों के लिए आंगन, छत या खुले स्थान पर बिखेरे जाने वाले विभिन्न प्रकार के अनाज के वह दाने जो पक्षियों का उदर पोषण करते हैं। खास कर बारिश के उन दिनों में जब धरती पर बिखरे अनाज के दाने बारिश की वजह से दब जाते हैं मिट्टी में।
कथानक में तीन पीढियां हैं…. मां….. उसकी बेटी सुरभि…. और सुरभि का बेटा समृद्ध…। पहली पीढ़ी सुरभि की मां…. अपनी बुजुर्ग पीढी से मिले पक्षियों को चुग्गा चुगाने के संस्कार को … अपनी बेटी सुरभि को हस्तांतरित करती है….। इस आशा और विश्वास के साथ कि इस संस्कार की सुगंध… सुरभि के रूप में फैल जाए आसपास के वातावरण में…। इसके लिए मां द्वारा पक्षियों को दाना चुगाये जाने के मानव के कर्तव्य को विभिन्न तर्कों और धार्मिक महत्व से बच्ची सुरभि के माध्यम से पाठक तक… बहुत आसानी के साथ पहुंचाया गया है। कथानक एक रेल यात्रा से शुरू होता है… जिसकी समाप्ति संस्कार के हस्तांतरण करने की यात्रा के साथ होकर एक संदेश दे जाती है… कि प्रकृति का ही हिस्सा मानव सहित पशु पक्षी और पेड़ पौधे भी होते हैं…। इन्हीं में से एक अंग पक्षी भी है…। मानव अपने विकास की गाथा लिखने में.. प्रकृति से कुछ ज्यादा ही छेड़छाड़ कर रहा है… जिसकी वजह से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है….। उस संतुलन को बनाए रखने में … मानव को ही अपनी भूमिका का निर्वाह प्रकृति के साथ मिलकर करना होगा…। इतना महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संदेश कथानक बिना कुछ कहे आसानी से कह जाता है। यही इस कथानक का लेखन सौंदर्य है….। और अंत में सुरभि अपने बेटे समृद्ध की छोटी छोटी हथेलियों में… दाना ही नहीं भरती… बल्कि भर देती है कुछ संस्कार… और जब कहती है बिखेर दे बेटा आंगन में… मानों पाठक से भी आग्रह कर रही हो … सौंप दो ऐसे संस्कार अपनी नई पीढ़ी के जीवन में…. भर दो उसकी अंजुरि… जिसे वह भी सौंप सके अपनी अगली पीढ़ी को…। कथानक सरल सहज और संदेश प्रद है…। बिना किसी अलंकारिक भाषा के.. बिना उपमानों और प्रतीकों जा सहारा लिए.. वह सब कुछ कह जाता है… जिसके लिए रचा गया था कथानक…..। बहुत बहुत बधाई सुरभि जी… आपके लेखन की सुगंध ने… महका दिया आज का दिन…।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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