साहित्य का सोपान

घर या बच्चों की प्रयोगशाला !

घर ” इस का जब जिक्र भी होता है ,बस एक सुकून सा छा जाता है | ये एक ऐसी दुनिया होती है जहाँ हम अपने मन की ज़िन्दगी जीने को स्वतंत्र होते हैं ,बगैर किसी आडम्बर के | माता-पिता उपलब्ध संसाधनों में परिवार के सदस्यों के लिए हर सुविधा जुटाने का प्रयास करते हैं | जब बात उनके बच्चों की आती है ,तो वो अपनी सीमा से भी आगे जा कर उनको संतुष्ट करना चाहते हैं | इस सुख और सुकून भरे माहौल में थोड़ी उलझनें तब जरूर सर उठाती लगती हैं जब वो अपने अपने बच्चों को हर क्षेत्र में शीर्ष पर ही देखना चाहतें हैं |

शीर्ष पर उन नन्हों को पहुँचा पाने की प्रक्रिया में अक्सर जब अपने आसपास देखते हैं तो पारम्परिक रूप से सफल हुए बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ सलाह लेने का प्रयास करते हैं | पर यही वो पल होता है जब बच्चे और अभिभावक एक दूसरे से थोड़े से दूर होने लगते हैं | अभिभावक सफल प्रमाणित हो चुके बच्चों की रीति के अनुसार उनका पालन-पोषण करना चाहते हैं | बच्चों का ध्येय और उनकी मंजिल उस से कुछ अलग भी हो सकती है ,अभिभावक अक्सर ये मानने को तैयार नहीं होते | बस इस पल से अभिभावक घर को प्रयोगशाला बना देते हैं ,जिसमें से एक सर्वगुणसम्पन्न प्रोडक्ट निकलना ही होगा |

हर व्यक्ति का व्यक्तित्व सर्वथा भिन्न होता है | दो भिन्नताओं को एक समान बनाने का प्रयास दो तरह की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है ……. एक तो उपहास की और दूसरी दमन की ! इन दोनों में से किसी भी परिस्थिति में उसकी अपनी प्रतिभा का लोप हो जाना निश्चित है | बच्चे को एक स्वतंत्र और परिपूर्ण व्यक्तित्व मान कर उससे विमर्श कर के कोई भी निर्णय लिया जाए ,तो उसका सफल होना अवश्यम्भावी होगा ,क्योंकि उसमें बच्चे की पूरी सार्थक ऊर्जा भी सम्मिलित होगी | अगर सिर्फ अपनी इच्छा से कोई निर्णय लेंगे ,तब भी बच्चा सफल हो तो सकता है ,पर उसको ज़िन्दगी से एक शिकायत हमेशा बनी रहेगी कि ये उसकी रूचि की अनदेखी है | इस तरह की शिकायत कभी-कभी हाथों के छूटने की सी अनुभूति करा जाती है |

बच्चों की जब आँखें भी नहीं खुल पा रही होती हैं ,तबसे ही वो हमारे हाथों को थाम लेते हैं ,पर ये हमारा व्यवहार ही है जो उनका हाथ धीरे-धीरे हमारे हाथों से छूटता चला जाता है | इस स्थिति की भी विडम्बना ये है कि छूटते हुए हाथों के लिए हम अपने उन बच्चों को कसूरवार मानते हैं जिनमें हमारी साँसे बसती हैं | अगर हम बच्चों का और उनकी इच्छा का सम्मान करेंगे तभी हम उनसे भी समान और संतुष्टि पायेंगे | घर को उनके लिए ऐसी जगह बनायें जहाँ हर व्यस्तता और सफलता के बावजूद भी आना चाहें ,न कि एक ऐसी प्रयोगशाला बना दें जहां से भागने के लिए वो छटपटायें !

निवेदिता श्रीवास्तव “निवी”
लखनऊ , उत्तरप्रदेश

एक नजर
संतान का लालन पालन … वर्तमान युग की सबसे बड़ी चुनोती है….। एक दौर था जब सन्तान को युवा होते देखकर बाप की छाती चौड़ी हो जाती थी… मां की आंखों में बहु लाने के सपने जाग उठते थे..। आज के युग में बच्चे के युवावस्था में कदम रखते ही मां की आंखों के आसपास काले घेरे अपना दायरा बढ़ा लेते हैं, बाप की कमर झुक जाती है।
यह जो बदलाव है… उस का कारण बच्चों के पालन पोषण के तौर तरीके गलत हो जाने का परिणाम है। संतान को नीति से पालना चाहिए … और मां उसे रुचि से पालते हैं..। यहीं वह चूक हो जाती है जब सन्तान के कुदरती गुणों का पालक ही एक प्रकार का मर्डर कर देते हैं…। उसके अंदर टारगेट और उसे पाने का जुनून इतना भर दिया जाता है कि… वह बच्चा मां बाप को भी सफलता के लिए सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर के उनसे दूर हो जाता है। इसके गवाह हैं हमारे देश में बढ़ते वृद्धाश्रम…।
इन्हीं सब बिंदुओं को लेखिका निवेदिता श्रीवास्तव निवि ने अपने लेख घर है प्रयोगशाला में शामिल किया है। लेख आगाह करता है बच्चों का लालन पालन समन्वय के साथ किया जाए.. हर क्षेत्र में सिरमौर बनाने की जगह उसकी रुचि के अनुसार विषय विशेष में विशेषज्ञ बनाया जाए। यह दौर ही विशेंषज्ञता का है। इस प्रकार के तमाम बिंदुओं की तरफ ध्यान आकर्षित करता यह लेख… ताजा ताजा मां बाप बने या बनने रहे… दंपत्तियों के लिए एक प्रकाश पुंज है। सामाजिक आवश्यकता वाले लेख के लिए लेखिका को बधाई।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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