साहित्य का सोपान

तुम नदी.. मैं बरगद

एक नदी है

जैसे आसमान की नीलाई
जैसे तुम्हारी आँख की गहराई

एक बड़ा बरगद है
शाखाएं इतनी जैसे मेरे मन में तुम्हारा ख़याल
जड़ें इतनी गहरी जैसे हमारा प्रेम

पर बरगद और नदी के बीच समतल जमीन है
जैसे हमारे बीच की दूरी
जैसे हमारे बीच का ये फासला

वो नदी तुम हो
और बरगद मैं

मैं ये दूरी तय कर लेता हूँ
और तब तुम मेरी शाख पर झूल जाना…

और मैं ये गज़ल गुनगुनाउंगा —

“”आपका साथ साथ फूलों का
आपकी बात बात फूलों की
फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की””

महेश गोस्वामी
लखनऊ,उत्तरप्रदेश

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