साहित्य का सोपान

एक वार्तालाप

 

“ बालक अपना परिचय दो “
द्रोण ने कहा
“ परिचय गुरुवर ?
मुझे परिचय के बंधनों में मत बांधिए
मैं तो हूं आत्मा
हूँ एक विचार
बहना निर्झर
है मेरा स्वाभाव “
गुरु द्रोण हँसे,
“ अरे मूर्ख,
किसने कहा विचार मुक्त है
विचार का भी
अपना भूत
अपना भविष्य है
इस सकल ब्रह्माण्ड में
कोई नहीं
परिचय के बंधन से मुक्त
इसलिए
मत घबराओ
स्वयं को
हमसे परिचित करवाओ “
“ तो गुरुवर
मेरा परिचय आपसे है
आप मेरे गुरु
और मैं शिष्य
एकलव्य हूँ। ”
द्रोण सकपकाए
“ मैं नहीं हूँ मुक्त
परिचय के विस्तार के लिए
गुरु दक्षिणा लाओ
मुझे स्वयं से मुक्त करो। ”
“ क्यों गुरुवर
जिसके हाथ में हो शस्त्र
जिह्वा पर हो मंत्र
क्या वह भी नहीं है मुक्त
परिचय के विस्तार के लिए ? “
गुरु थम गए
अश्रु बह गए
अभिमान गल गया
और वह वहाँ शिला पर बैठ गए
“ पुत्र
यही तो जीवन सत्य है
यहां प्यास को भी
करना पड़ता है नियंत्रित
तुम अधिकारी हो
या तो आत्मा और मन की प्यास के
या केवल तन की प्यास के
मैं चाहता हूँ पूर्ति
अपनी सम्पूर्ण प्यास की
तुम यदि बाधा हो
तो मैं क्या करूँ ?
मैं नहीं हूँ विधाता
जो भाग्य लिखता फिरूं
तुम्ही कहो
अपनी प्यास को
कहां तक नियंत्रित करूँ ?
और वो भी मात्र इसलिए
क्योंकि हूँ मैं बलशाली
श्रेष्ठ विद्याधारी
सोच सकता हूँ
सिर्फ अपने नहीं ,
सबके लिए
दे सकता हूँ
दूसरों से अधिक
फिर क्यों न पाऊं
जो पा सकता है हर कोई ?
कौरव और पांडव
गर्व से अड़े रहे
गुरु और शिष्य
पीड़ा हजम गए।

शशि महाजन , अबुजा , नाइजीरिया

एक नजर

एक वार्तालाप …. एक ऐसी कविता है जो प्रनिधित्व करती तो द्वापर का है लेकिन मानव की हर दौर की मानसिकता की साक्षी है। गुरु द्रोणाचार्य और उनके शिष्य एकलव्य का वार्तालाप है। वह शिष्य जिसने गुरु द्रोण के शिक्षा देने से इंकार करने पर उनकी मूर्ति से धनुर्विद्या सीख ली। वह भी श्रेष्ठतम..। समयानुसार प्रदर्शन भी कर दिया और यहीं से श्रीगणेश होता है वार्तालाप का।
परिचय शुरू हुआ वार्तालाप पहले तो जीवन दर्शन के सूत्र पकड़ाता है कि परिचय के बंधन से कोई मुक्त नहीं…. परिचय का भी अपना पास्ट और फ्यूचर होता है। एकलव्य के परिचय देने के बाद ही शनैः शनैः आगे कदम बढ़ाते वार्तालाप में द्रोण की कुंठा भी नजर आती है कि विद्या का श्रेष्ठ जानकार होने के बाद भी द्रुपद जैसा मित्र उनकी मित्रता को वैभव से तोलता है। यह कथा जिन पाठक को याद है वह द्रोण के संवाद में इसका अनकहा पक्ष झांक लेते हैं। जिसमें पांडवों की मदद से द्रुपद का अभिमान भंग किया था।
बात आती है एकलव्य की श्रेष्ठता की… जिसे गुरु स्वीकार तो करते हैं कि तुम अधिकारी हो लेकिन स्वयं के स्वार्थ वश राजपुरुष को श्रेष्ठ बनाने की लालसा जाग्रत होती है और गुरु दक्षिणा में एकलव्य से अंगूठा मांगकर उसे भी इतिहास पुरुष का दर्जा गुरु दे ही जाते हैं। खुद के ज्यादा पाने की चाह में कौरव पांडव के अहम को संतुष्ट करते हुए दोनों गुरु शिष्य अपने अपने हिस्से का दर्द पी जाते हैं। यही कविता का मर्म है। शशि जी की लेखनी पौराणिक कथाओं में से वर्तमान के संदर्भों की खोज करने में माहिर है । इसकी बधाई तो बनती है।

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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