साहित्य का सोपान

मेरी सासू मां

“मेरी सासू मां”

गोल भरा हुआ गंभीरता ओढ़े हुआ शालीन चेहरा,गोल काली आंखें ,गोरा रंग ,पतली लेकिन करीने से गूंथी चोटी और औसत से थोड़ी कम लाबी लेकिन गठे और भरे बदन की मालकिन थी मेरी सासू मां “श्रीमती उर्मिला मिश्रा जी”।
बेहद कम उम्र में पति के कैंसर से गुजर जाने के बाद तीन मासूम बच्चों की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों की दुनियादारी ने बहुत कुछ बदल दिया उनके भीतर।
सारे शौक ,उनकी मुस्कान सब दब गए और उसकी जगह ले ली ऊपर से सख्त और अविश्वास भरी एक नई महिला ने।मेरा उनसे परिचय इसी रूप में हुआ था।भीतर से थोड़ा भय भी लगा पर कर्मठ होने के कारण सब ठीक ही होने लगा।मेरे काम और सेवा भाव से संतुष्ट होकर उन्होंने मुझे अपने हिसाब से काम करने की थोड़ी आजादी भी दे दी थी।
एक बात जो उनमें बेहद खास थी वो ये कि वे जो भी काम करती बेहद कुशलता और करीने से करतीं थीं फिर चाहे स्वेटर बुनना हो या किसी कपड़े की बखिया तुरपन।
उनके एक एक टांकें की लंबाई एक बराबर और एक सीधी रेखा में होती जो मुझे चकित कर देता।
कभी उनके हाथ की रोटियां खाने का अवसर मिलता तो मैं देखती की उनकी हर रोटी वजन और आकार में बिल्कुल एक बराबर।
इतना कुशल कार्य कि हैरानी से मैं दांतों तले उंगली दबा लेती।
बस एक ही कमी नजर आती मुझे जो शायद हालात की देन थी कि वो बहुत अविश्वासी थीं और कान की भी थोड़ी कच्ची हो गईं थी
इस के चलते मेरे और उनके बीच कई बार मनमुटाव भी चलता रहा लेकिन मैं भी अड़ियल टट्टू की तरह जब उनके गले में बाहें डाल कर माफी मांगती तो न चाह कर भी उन्हें मुझे माफ करना ही पड़ता।
मेरे पति और घर के बाकी सब लोग मुझे हैरानी से देखते क्योंकि उनके इतना करीब जाने की हिम्मत किसी में नहीं होती थी।
फुरसत में वो मुझे अपने बचपन के किस्से बहुत चाव से सुनाती थीं अपने माता पिता की इकलौती संतान होने के कारण बहुत लाड़ली थीं,घर की बनी पूड़ी उन्हें अच्छी नहीं लगती थी तो उनके पिताजी उनके लिए उस जमाने में भी बाजार से पूड़ी खरीद कर लाते थे।उनकी हर इच्छा पिताजी बड़े प्यार से पूरी करते थे।ये सब बताते हुए उनका चेहरा आज भी गर्व से दमक उठता था।
लेकिन पुत्र न होने के कारण जब पिताजी ने दूसरी शादी कर ली तो जो दर्द उनकी मां को महसूस हुआ वो उनकी आंखों में आज भी ये बताते हुए झलक उठता।
एक बार जब वो बहुत बीमार हुई तब मेरी उनसे बोलचाल बन्द थी लेकिन जब मैं उनके पास गई और उनसे पुनः सेवा करने का हक मांगा तो पहले तो ऊपरी नानुकुर करने लगीं फिर मान गईं शायद उन्हें भी पता था कि इतने मान और प्रेम से यही मेरा ख्याल रख सकती है।
उसके बाद जो हमारी दोस्ती शुरू हुई वो उनकी मृत्यु तक कायम रही।
मेरी बेटी जिसे जन्म पर वो देखने भी नही आईं थीं वो उनकी आंखों का तारा बन गई थी खूब आशीष देती उसके सीधे और भोलेपन पर।
सन 2012में अचानक हृदयघात से लखनऊ में रात पौने दो बजे मेरे ही आंखों के सामने मेरा हाथ थामे उन्होंने आखिरी सांस ली।
जाने से कुछ समय पूर्व कहे उनके शब्द याद आते हैं “अब तुमसे कोई शिकायत नहीं”!
ईश्वर से यही शिकायत रही मुझे जब सब बहुत मधुर हो गया तब उनका हाथ सिर से उठा लिया।कुछ वक्त और देते साथ गुजारने के लिए ताकि बहुत कुछ जो अनकहा रह गया बांट लेती उनके साथ।
नमन मां !आप आज भी वैसे ही स्मृतियों में हिलोरे लेती हो जैसे छोड़कर गई थी।

मीतू मिश्रा
हरदोई, उत्तरप्रदेश

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