लेख

आम और आम आदमी का निचुड़ता रस…

प्रसंगवश

शैलेश तिवारी

आम …… एक ऐसा खास फल है जिसे फलों का राजा कहा जाता है…. मगर यही आम जब आदमी के साथ लग जाता है तो आम आदमी दुर्गति का शिकार होकर नारकीय जीवन जीने तक को मजबूर हो जाता है….। उसके सम्भावित नारकीय जीवन में उसकी मुफलिसी के साथ साथ नेताओं के वादे और प्रशासन का… कल आ जाने … का जुमला भी खूब रंग दिखाता है….।

आम और आम आदमी दोनों का रुतबा और हैसियत भले ही अलग अलग हो लेकिन हश्र दोनों का एक जैसा है…। सफर की शुरुआत आम्र मंजरी की भीनी भीनी खुशबू से करते हैं …. जो किसी को भी मदहोश कर देने के लिए काफी है तो आम आदमी की किशोर वय… अपनी शरारतों और शैतानियों के लिए याद की जाती है… । आम्र मंजरी के यौवन को प्राप्त होते ही भ्रमर मंडराते हुए उसके आसपास गुंजन कर मंजरी के पराग कणों को पाने के लिए बेताब हो जाया करते हैं तो आम आदमी के किशोर सखा भी टोली बनाकर किसी मंजरी के स्कूल जाने से लेकर उसकी जरूरत की किताबें पहुंचाने का पूरा ख्याल रखते हैं…। हालांकि अब वह दौर नहीं है जब किताबें बाकायदा पोस्टमेन की भूमिका निभाया करती थी लेकिन अब एक दस अंकों का वह नंबर साइंस ने ईजाद कर के किशोर अवस्था को पकड़ा दिया है कि छोरा छोरी के स्वर्गस्थ पितामह और मातामह भी इनकी कारस्तानियों को नहीं पकड़ सकते….।

खैर आम्र मंजरी जब अपने यौवन को त्याग एक नया रूप धारण करती है तो बागों में झूले पड़ जाते हैं…. जिन पर पींगे भरते हुए युवा हो रहा आम आदमी… अमियाँ आ जाने के गीत गुनगुनाने लगता है….। यहीं से दोनों की दास्तां एक सी इबारत से लिखी जाने लगती है…। हालांकि इबारतों के लफ्जों से जिस क्रिया के किए जाने का बोध … प्राप्त होता है…। उस क्रिया के परिणाम में …. एक की गति से किसी को स्वाद का लजीज अहसास होता है …..तो दूसरे की गति से उसकी, उसके परिवार और कुछ हद तक समाज की सेहत नासाज हो जाती है…. और होंठ के किनारे … पूरी ताकत से दाँतों से भींचने की कोशिशें भी नाकाम साबित हो जाती हैं…. और मुंह से न चाहते हुए भी… आह निकल जाती है…।

खैर लौट चलते हैं विषय के मुख्य मार्ग पर…. जहां अमियाँ या केरी छोटी छोटी ही होती हैं… कुछ हवा के तेज झोंकों को सहन नहीं कर पाने की वजह से शाख का साथ छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं तो कुछ पत्तों की ओट में अपने आप को छिपाए रखने की तमाम कोशिशों के बावजूद या तो किसी शरारती बच्चे के ताक कर निशाना लगाए गए पत्थरों का शिकार होकर जमीन पर टपक जाती हैं… अथवा किसी बांस की सहायता से तोड़ ली जाती हैं…। अब इन तोड़ी गई केरियां .. दो तरह की गति को पा जाने की सम्भावना को जन्म देती हैं…. पहली चाकू की तेज धार से काटकर….. खट्टी मीठी लौंजी के रूप में परिवर्तित कर दी जाएं…. या फिर सिल बट्टे पर रगड़ रगड़ कर पौदीने के साथ पीस कर चटनी में रूपांतरित हो जाए…. हालांकि अब उतने प्यार और इत्मीनान से सिल पर बट्टे चलाने वाले हाथ बूढ़े हो चुके हैं…. ज़माने ने तरक्की के नए आयाम छू लिए हैं…. छोटे छोटे पीस कर के मिक्सी में डाल दो… और चटनी के नाम पर एक ऐसा महीन पेस्ट थाली मे स्थान पा जाता है… जो टेस्ट में भले ही अमियाँ लगे लेकिन… सिल बट्टे की चटनी वाली संतुष्टि नहीं दे पाती…..। इसके साथ ही …. इसका जायका जोरदार बनाने के लिए… इसे कसा जाता है…. फिर इसकी खटास का मेल शकर की मिठास से कराकर.. इसको मुरब्बे का स्वरूप भी दिया जाता है।

और एक गति की तरफ इस कच्ची केरी की नियति लिखी होती है…. जिसमें जब इसकी गुठली में जाली पड़ चूकती है… तब इसको आम कटने से काटा जाता है… रोजमर्रा के पारम्परिक मसालों के साथ…. कुछ विशिष्ट मसालों का संयोग करा कर…. इसको अचार बनाने की प्रक्रिया में प्रवेश कराया जाता है….. कुछ दिन की धूप और छाया का सुख मिलने के बाद फिर सरसों के तेल की स्निग्धता में डूब कर यह नई काया को हासिल कर लेने की दिशा में आगे बढ़ता हुआ… बरनी में शोभा पा लेने के बाद ….अचार के पद को प्राप्त कर लेता है….।

कुछ अधकच्ची केरियों को पहले घास की प्याल लगाकर तो… आजकल कार्बाइड से पकाकर.. पके आम का वह स्वरूप दे दिया जाता है…. जिसे पहले दोनों हाथों के अंगूठों से पिलपिला कर… चूसा जाकर रस की एक एक बूंद.. निचोड़ ली जाती है.. या फिर यही आम चाकू की तेज धार… का सामना करते हुए… चीर चीर में विभाजित होकर… भोजन की थाली की शोभा बन जाता है…. यानि आम अपने शैशव काल से लेकर…. अंत तक नाना प्रकार की गतियों को प्राप्त होता रहता है… यही उसकी नियति है… ।
अब चर्चा उस आम आदमी की…. जो पहले जन्म तो आदमी के रूप में ही लेता है… लेकिन आम शब्द के जुड़ जाने से आम आदमी की शक्ल अख्तियार कर लेता है….। उस आम आदमी की नियति भी .. आम से मिलती जुलती होती है… जो परिस्थितियों में पिसता हुआ…. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही.. परिवार का सहारा बनने के लिए.. कटने और खटने के लिए तैयार हो जाता है…. रोजगार दाता भला मानुष मिल जाए तो ज़िन्दगी में … मुरब्बे की तरह कुछ मिठास आ जाती है… परंतु महंगाई, बेरोजगारी, तंगहाली, गिरी हुई अर्थ व्यवस्था आदि आदि के नाना प्रकार के मसाले उसके जीवन को अचार बना ही देते हैं…. कभी सरकार की नीतियां उसकी ज़िन्दगी के रस की एक एक बूंद निचोड़ती रहती हैं…. तो कभी उसका नियोक्ता इस कर्म कांड को सम्पन्न करता है…। कभी बेबसी की धूप उसे सुखा डालती है… तो कभी मजबूरी का तड़का लग जाता है… तमाम संकटों से संघर्ष करते हुए भी.. उसकी जुबां पर ताला ही रहता है… उफ्फ तक नहीं करता… हर मिलने वाले के पूछने पर… सब कुछ मजे में बताना उसकी नियति में शुमार होता है…। जबकि इसके चुकाए तरह तरह के टेक्स से.. इसके रहनुमा … रसूखदार जीवन यापन करते हैं…। आम तुमने आदमी से नाता क्या जोड़ा…. आम आदमी आज भी कुटने, पिसने, छीला जाने,रस देने, आदि आदि का पूरा आदी हो चुका है…आम आदमी का सहारा तो केवल नीली छतरी वाला है.. वही उसकी नैया का खेवनहार है….. बाकी उसके रहनुमा तो उसके उपयोग की नई नई रेसिपी खोजते ही रहते हैं… कि अब इस आम आदमी का तेल और अधिक कैसे निकाला जाए।                                               शैलेश तिवारी 

 

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