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महबूबा मुफ्ती: दशकों के राजनीतिक इतिहास से मुक्ति___राजेश शर्मा

राजनीति जीती और हार गए कश्मीर के बाशिंदे

महबूबा मुफ्ती: दशकों के राजनीतिक इतिहास से मुक्ति

राजेश शर्मा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली में अकारण सजाई गई महफिल में महबूबा मुफ्ती ने जो पड़ोसी देश के प्रति मोहब्बत उगली वह नई नहीं है।….”यह तो होना ही था”
सर्प को कितना ही दूध पिलाओ वह अपनी तासीर नहीं छोड़ता और जहर उगल ही देता है। यह अलग बात है कि सपेरा उसके जहरीले दांत को पहले ही तोड़ चुका होता है। शायद इस मर्तबा सपेरे ने महफ़िल इसीलिए सजायी हो__कि देखें सर्प (नागिन) अपनी आदत से बाज आई के नहीं !!
नागिन ने अपनी मस्तिष्क की सोच को जुबान से उगल ही दिया और खासबात यह कि वह इस रहस्य को समझ भी नहीं पाई कि “सपेरे” ने तुम्हें बचे-खुचे जहर को उगलाने के लिए ही बुलवाया था।
यह कोई विमान अपहृत वाला मामला नहीं, जिसे मरहूम मो. सईद अपनी तीसरी बेटी को बचाने की एवज में हरामखोर आतंकवादियों को रिहा करवा बैठे थे। कश्मीर से कांग्रेस ने शमशीर तानी और चमकाई हैं यह बात अब मुल्क का बच्चा-बच्चा जानता है।
जनचर्चा में शुमार एक सवाल कि, महबूबा पाकिस्तान क्या तुम्हारा महबूब है ? खुलासा करो। तुमने खंबा नोचा..तुम्हारे साथ खिसियाए ओर भी बेनकाब हो गए__ यानि पूरा गिरोह।

गिरोह सरगना के बारे में

महबूबा मुफ़्ती (जन्म: 22 मई 1959, बिजबिहारा), एक भारतीय राजनीतिज्ञ तथा जम्मू और कश्मीर की तेरहवीं एवं एक महिला के रूप में राज्य की प्रथम मुख्यमंत्री’– महबूबा मुफ्ती से पूर्व वर्ष 1980 में सैयदा अनवरा तैमूर किसी भारतीय राज्य (असम) की पहली मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी थीं। इस प्रकार वे देश के किसी राज्य की दूसरी मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी,, वे अनंतनाग से लोकसभा सांसद बनी, साथ ही जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की राजनेत्री और अध्यक्षा तथा जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की पुत्री हैं। वालिद का बीमारी के बाद एम्स, दिल्ली में इंतकाल हो जाने के पश्चात वो जम्मू एंड कश्मीर की मुख्यमंत्री बनी।
महबूबा मुफ़्ती जम्मू और कश्मीर की पहली महिला राजनेत्री है।
दिवंगत मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद अटल इरादों और बड़े तूफानों में भी अपनी कश्ती को पार लगाने की कूवत रखने के लिए जाने जाते थे। उनकी आंखों में कश्मीर की राजनीति के दशकों के अनुभव की रोशनी साफ नजर आती थी।
एक गूढ़ वकील से लेकर देश के अब तक के एकमात्र मुस्लिम गृहमंत्री बनने तक का सफर तय करने वाले मुफ्ती मुहम्मद सईद ने एक मंझे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की तरह राष्ट्रीय राजनीति और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाया था।

मरहूम सईद को मृदुभाषी और सौम्य राजनेता के रूप में देखा जाता था लेकिन देश के पहले मुस्लिम गृहमंत्री की छवि को उस समय आघात लगा था जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली उनकी सरकार ने उनकी तीन बेटियों में से एक रूबिया की रिहाई के बदले में पांच आतंकियों को छोड़ने की मांग के आगे घुटने टेक दिए थे। रूबिया की रिहाई के बदले में आतंकियों की रिहाई के संवेदनशील राज्य जम्मू कश्मीर की राजनीति में दूरगामी प्रभाव पड़े थे।

दरअसल दो दिसंबर 1989 को राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार के गठन के पांच दिन के बाद ही रूबिया का अपहरण कर लिया गया था। अक्सर अपनी राजनीतिक निष्ठाओं को बदलते रहने वाले सईद उस समय केंद्र में गृहमंत्री थे जब घाटी में आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू किया था और उसी समय 1990 में वादियों से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की कुख्यात कहानी शुरू हुई।
तब रूबिया को आतंकियों से छुड़ाने के लिए उनकी मांगें मानने के लिए उनकी काफी आलोचना हुई थी। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर उस समय भारत सरकार ने आतंकियों के सामने घुटने नहीं टेके होते तो कश्मीर में आतंकी गतिविधियां इतनी नहीं बढ़तीं। यह कटु सत्य भी है।

लगभग 6 दशक तक के अपने राजनीतिक करियर में सईद ताकतवर अब्दुल्ला परिवार के खिलाफ प्रतिद्वंद्वी शक्ति का केंद्र बनकर उभरे। राजनीति के खेल में हमेशा अपने पत्ते छिपाकर रखने वाले सईद अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप चलने के लिए विरोधाभासी विचारधाराओं वाले दलों के साथ भी दोस्ती में गुरेज नहीं करते थे।

सईद के राजनीतिक सफर में 2 सबसे अहम पड़ाव वर्ष 1989 और वर्ष 2015 में आए। वर्ष 1989 में वे स्वतंत्र भारत के पहले मुस्लिम गृहमंत्री बने और बीते साल वे दूसरी बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। आगामी 12 जनवरी को 80 साल के हो जाने वाले सईद ने इस बार जम्मू कश्मीर की सत्ता संभालने के लिए उस भाजपा के साथ गठबंधन किया जिसके लिए इस मुस्लिम बहुल राज्य में सत्ता में आने का यह पहला मौका था।

अपनी बेटी महबूबा मुफ्ती के साथ 1999 में खुद की राजनीतिक पार्टी पीडीपी का गठन करने से पूर्व सईद ने अपने राजनीतिक करियर का लंबा समय कांग्रेस में बिताया और कुछ समय वह वीपी सिंह के तहत जनमोर्चे में भी रहे। 1950 के दशक में वह जीएम सादिक की कमान में डेमोक्रेटिक नेशनल कांफ्रेंस के सदस्य भी रहे। मुफ्ती मुहम्मद सईद वर्तमान में पीडीपी के संरक्षक थे। 2014 के चुनावों में वे अनंतनाग सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हिलाल अहमद शाह को 6028 वोटों के अंतर से हराकर विधायक निर्वाचित हुए थे।

मुफ्ती मुहम्मद सईद का जन्म 12 जनवरी 1936 को हुआ था और 1950 में वे नेकां में राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए थे, लेकिन नेकां से जल्दी ही उनका मोहभंग हो गया और वे कांग्रेस में शामिल हो गए। जम्मू कश्मीर में नेकां के सामने कांग्रेस को एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा करने में मुफ्ती सईद ने अहम भूमिका अदा की। सईद 1971 में राज्य में कांग्रेस सरकार में पहली बार मंत्री बने लेकिन ये दौर बहुत छोटा चला क्योंकि अगले दो चुनावों में उन्हें जीत नहीं मिल सकी।

सईद ने गृहमंत्री के रूप में पदभार उस समय संभाला था, जब उनके इस गृहराज्य में आतंकवाद ने अपना घिनौना रूप दिखाना शुरू किया था। गृह मंत्रालय में उनके इस कार्यकाल को जेकेएलएफ द्वारा उनकी तीसरी बेटी रूबिया के अपहरण किए जाने के साथ जोड़कर याद किया जाता है। आतंकियों ने रूबिया की रिहाई के बदले अपने 5 साथियों को छोड़ने की मांग की थी और अपनी मांग पूरी होने पर ही रूबिया को छोड़ा था। सईद के प्रतिद्वंद्वियों के अनुसार इस अपहरण और फिर आतंकियों की रिहाई ने पहली बार भारत को एक ‘कमजोर देश’ के रूप में पेश किया।

अनंतनाग जिले में बिजबेहड़ा के बाबा मोहल्ला में 12 जनवरी 1936 को जन्मे सईद ने प्राथमिक शिक्षा एक स्थानीय स्कूल में ग्रहण की और उन्होंने श्रीनगर के एसपी कॉलेज से स्नातक किया। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री और अरब इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने 1950 के दशक के आखिर में जीएम सादिक की डेमोक्रेटिक नेशनल कांफ्रेंस में शामिल होकर राजनीति की दुनिया में कदम रखा। सादिक ने युवा वकील की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें पार्टी का जिला संयोजक नियुक्त किया।

मुफ्ती को लंबे समय तक जीत नहीं मिल सकी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 1989 में जम्मू कश्मीर से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर पहुंचे। उस वर्ष वे देश के पहले मुस्लिम गृहमंत्री बने। लेकिन अपनी बेटी को आतंकियों के हाथों से छुड़ाने के लिए मुफ्ती सईद ने जो समझौता किया उस पर उनकी खासी आलोचना हुई। उनके कई आलोचक उन्हें अवसरवादी और समय-समय पर अपनी प्रतिबद्धताएं बदलने वाला सियसती भी कहते हैं।

नेकां के साथ उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया लेकिन जल्दी ही उसे छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। वहां भी जब ज्यादा दिन तक कामयाबी नहीं मिली तो जनता दल का दामन पकड़ा, लेकिन उसे भी छोड़कर कांग्रेस में वापस आ गए। आखिरकार कांग्रेस एक बार फिर छोड़ी और पीडीपी के नाम से एक नई पार्टी बनाई।

हाल के चुनावों में पीडीपी एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में उभरी थी। लेकिन पीडीपी को इस मुकाम पर लाने में मुफ्ती सईद की एक अन्य बेटी महबूबा मुफ्ती की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। महबूबा मुफ्ती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संगठित किया और चुनाव अभियान का रचनात्मक नेतृत्व किया जिससे पीडीपी महत्वपूर्ण संख्या के आंकड़े पर पहुंच सकी थी।

सईद 1962 में बिजबिहाड़ा से राज्य विधानसभा में चुने गए। उन्होंने 5 साल बाद भी इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। उन्हें सादिक ने उपमंत्री नियुक्त किया। सादिक उस समय मुख्यमंत्री थे। वे कुछ साल बाद पार्टी से अलग हो गए और कांग्रेस में शामिल हो गए, जो ऐसे समय में एक साहसिक लेकिन जोखिमभरा कदम था जबकि जेल में बंद शेख मुहम्मद अब्दुल्ला को अधिकतर कश्मीरियों का भारी समर्थन प्राप्त था।

एक दक्ष आयोजक और प्रशासक समझे जाने वाले सईद ने यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस घाटी में न केवल अपने पैर जमाए बल्कि उन्होंने पार्टी के लिए भारी समर्थन भी पैदा किया। वे 1972 में एक कैबिनेट मंत्री और विधान परिषद में कांग्रेस दल के नेता बने। उन्हें 2 वर्ष बाद कांग्रेस की राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया गया।

राजनीतिक कद में तेजी से वृद्धि होने के बाद सईद खुद को राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखने लगे थे। हालांकि राज्य के इस सर्वोच्च पद को पाने की उनकी सभी उम्मीदें उस समय धराशायी हो गईं, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अब्दुल्ला के साथ एक समझौता कर लिया और 11 साल के अंतराल के बाद मुख्यमंत्री के रूप में उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इंदिरा का यह फैसला कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं और विशेष तौर पर सईद की मर्जी के खिलाफ था।

आसानी से हार न मानने वाले सईद ने वर्ष 1977 के चुनाव से पहले एक तरह के सत्ता परिवर्तन की स्थिति पैदा कर दी, क्योंकि कांग्रेस ने अब्दुल्ला सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। यहां सईद का लक्ष्य चुनावों के दौरान आधिकारिक मशीनरी पर नियंत्रण रखने के लिए मुख्यमंत्री पद पर कांग्रेस के व्यक्ति को आसीन करवाना था, जो कि खुद सईद ही होते। लेकिन तत्कालीन राज्यपाल एलके झा ने राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया। यह पहली बार हुआ था कि जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लगा था। हालांकि बाद में सभी 5 अवसरों पर राज्यपाल शासन लागू करवाने में सईद ने एक अहम भूमिका निभाई।

वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य का मुख्यमंत्री बनने के सईद के सपनों पर पानी फेर दिया था, क्योंकि अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ गई थी। वर्ष 1986 में जब राज्य में दूसरी बार राज्यपाल शासन लगा तो इसमें सईद ने एक अहम भूमिका निभाई थी। सईद को भाजपा ने टेका लगाया था।

सिक्के का दूसरा पहलू…

राजनीति के विशारदों के मतानुसार पूरी मीटिंग का आयोजन सुनियोजित था। बेवजह बुलायी गई मीटिंग में सबको पहले से ही तोते की तरह रटवा दिया गया था कि इतना बोलना—इससे ज्यादा नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार मीटिंग का आयोजन आगामी लोकसभा-विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत रखा गया था। वरना मजमा लगाने का कोई मतलब ही नहीं था। और यदि लगाना ही था तो इसके कायदे का समय दो वर्ष पूर्व का था। नागिन को कांडी में लेकर…..डमरू बजाने का हुनर !! मगर जनता तो “दायी” है उससे कहां छुपता “पेट”।

राजनीति जीती और हार गए कश्मीर के बाशिंदे

कभी सांप की तरह टेढ़ी मेढ़ी चलने वाली राजनीति हो या फिर बिछी हुई बिछात पर ढाई घर की चाल से शह और मात का खेल खेलती राजनीति हो, हर हाल में मरण तो प्यादों की होती है। ऐसा ही कुछ हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली ने धड़कते दिल से प्रधानमंत्री के आवास पर सम्पन्न हुई बैठक में खुली आंखों से देखा है। राजनीति के कई दौर के बदलने की गवाह रही लुटियन की दिल्ली इस बार उन विस्थापितों की पीड़ा की साक्षी बन गई, जिन्हें अपनी जमीन जायदाद व्यापार और घर छोड़े हुए तीन दशकों से ज्यादा का वक्त हो चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के सभी राजनैतिक दलों के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े राजनेताओं का जमावड़ा अपने आवास पर लगवाकर कश्मीर मे बदलाव के संकेत तो दिए लेकिन इन बदलावों पर रायमशविरा उन्हीं नेताओं से किया गया जिन्हें धारा 370 हटाने के वक्त लंबे लंबे समय के लिए नजरबंद किया गया था। जिनमे से कुछ ने पाकिस्तान का राग अलापा तो किसी ने माँ भारती के सुर में सुर मिलाए। या फिर कोई उतना ही बोला जितनी चाबी सत्ता ने भरी थी। इन तमाम वार्ताओं के बीच कश्मीर के उस आम आदमी की कराह को अनसुना करः दिया गया जो बीते दो सालों से न कुछ कमा पा रहा है और न ही ठीक तरीके से कुछ खा पा रहा है। उस कॉमन मेन की तरह ही वहां की हिन्दू और सिक्ख आबादी के नुमाइंदों की राय लेना दिल्ली दरबार ने उचित नहीं समझा जो घाटी में दोयम दर्जे का जीवन जी रहे हैं। न ही वहां के छात्रों के भविष्य को लेकर कोई राय मशविरा बैठक के दौरान किये जाने की चर्चा अंदरखानो से निकल कर बाहर आई है। जिस बिना पर यह कहा जा सके कि घाटी में आम जान जीवन बहाल करने के लिए अलग अलग विचारों वाली मुंडियां एक ही जाजम पर साथ साथ नजर आई।
भाजपा के नेता यह बयान देने में खुद को तीस मार खां समझते रहते हैं कि धारा 370 हटने के बाद अब कश्मीर की कली को दुल्हन बंनाने की आजादी मिल गई है या फिर बेरोजगार, महंगाई से त्रस्त , खाली जेब हो चुके और हो रहे देश वासियों को यह दिवा स्वप्न दिखाया जाता है कि अब आप कश्मीर में भी प्लॉट खरीदने के हकदार हो गए हो।
परंतु कश्मीर की घाटी से तीस साल से ज्यादा वक्त पहले जो पंडित विस्थापित हुए, उनके पुनर्वास के बारे में इन नेताओं के कोई चर्चा की? बस जैसे तैसे चुनाव करवा दिए जाएं तो लोकतंत्र घाटी में ज़िंदा हो जाएगा। वहां के विस्थापित बाशिंदों की वापसी का यक्ष प्रश्न अभी भी वहीं का वहीं खड़ा है। सामान्य रूप से उनकी खैर खबर पूछने का वक्त भी दिल्ली में जूटे इन तमाम रहनुमाओं के पास नहीं निकला। कहा जाए तो राजनीति जीत गई और कश्मीर के बाशिंदे हार गए।

राजेश शर्मा

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