साहित्य का सोपान

गज़ल…

गज़ल

जानकर भी क्यों बने अनजान सब
कुछ दिनों के है यहाँ मेहमान सब

आगमन के साथ ही लिक्खी विदा
क्यों नहीं इस सच को लेते मान सब

वाहवाही के लिये ही आजकल
दे रहे मिस्कीन को हैं दान सब

है तबाही का हि सामाँ इश्क ये
खेलते हैं आग से नादान सब

अब विदाई की घड़ी भी आ गयी
लद चुका है आपका सामान सब

ये वबा तो देन है इन्सान की
‘रश्मि’ लो अपनी ख़ता पहचान सब

डॉ०स्वदेश मल्होत्रा ‘रश्मि’
अयोध्या, उत्तरप्रदेश

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