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सत्ता और पद के लालच में होने वाली दलबदलू राजनीति पर पाबंदी लगना जरूरी

 

विजया पाठक,

मध्य प्रदेश सहित देश की राजनीति में पिछले कुछ समय एक अलग तरह की परंपरा अपने पैर पसारती जा रहा है। और इस विकसित होती इस परंपरा से यदि कोई सबसे ज्यादा प्रभावित होता है तो वो है देश की जनता। लेकिन देश की सत्ता पर बैठे राजनीतिक नुमाइंदों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो सिर्फ किसी भी तरह से अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए प्रयारसत रहते है। दारअसल देखा जाए तो पिछले कुछ सालों में राजनीति में चुनाव के बाद जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है। फिर वो चाहे मप्र, बिहार, छग हो या फिर राजस्थान। हम सभी ने देखा कि जबसे देश में मोदी सरकार ने सत्ता कायम की है तभी से जोड़-तोड़ की राजनीति अधिक देखने को मिल रही है। इसका सबसे बड़ा गवाह है मप्र। 18 महीने की कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को सिंधिया के साथ मिलकर जिस तरह से जोड़-तोड़ कर गिराया गया। वो दिन प्रदेश के राजीनितक इतिहास में ऐतिहासिक रहा। यह वो दिन था जिसे आने वाले कई सालो तक सिर्फ इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कुर्सी की लालच में कमलनाथ सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई। इतना ही नहीं इससे पहले महाराष्ट्र में भी उद्वव ठाकरे सरकार को पटकनी देने की तैयारी में भाजपा थी, लेकिन शिवसेना की किस्मत रही कि वो बच गई। हाल ही में बिहार में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भी यही कुछ दृश्य देखने को मिले जहां ममता बैनर्जी की पार्टी के कई नेता चुनाव के पहले ही भाजपा में शामिल हो लिए। इन दिनों ऱाजस्थान में एक बार राजनीतिक उठा पटक देखने को मिल रही है और इस भूचाल के अहम किरदार है राजस्थान के डिप्टी सीएम और ज्योतिरादित्य सिंधिया के मित्र सचिन पायलट। पायलट अपने समर्थको के साथ गहलोत सरकार को बीच बीच में झटका देते रहते है। ऐसा ही झटका इन दिनों वे फिर दे रहे है। यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि आखिर इन सबका नतीजा क्या निकलता है।
अब बात की जाए जोड़-तोड़ की राजनीति की पैदा होती इस परंपरा की, तो यह बात समझने वाली है कि लोकतंत्र में इस तरह खरीद फरोख्त कर सरकारो को गिराने की परंपरा को अब समाप्त हो जाना चाहिए। क्योंकि इससे सिर्फ जनता के टैक्स से एकत्रित गिए गए करोड़ रुपए खर्च की बर्बादी होती है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस संबंध में तुरंत एक्शन लेकर चुनाव आयोग को यह निर्देश देना चाहिए कि जिस भी राज्य में जोड़-तोड़ की राजनीति के कारण उपचुनाव कराने की जैसी स्थिति पैदा होती है वहां के उपचुनाव का खर्च संबंधित पार्टी ही उठाए। जनता के टैक्स के पैसो से उपचुनाव पर पूरी तरह पाबंदी लगना चाहिए। तभी राजनीतिक गलियारो में खलबली मचेगी और जोड़-तोड़ की राजनीति में कुछ अंकुश लग सकेगा।
एक सवाल जो बार-बार मन में उठता है वो यह कि पद, प्रतिष्ठा की लालसा में जिस तरह से राजनेता अपने दल बदलकर दूसरे दलो के साथ मिलकर सरकार बनाने का कार्य करते है। आखिर संबंधित पार्टी के अंदर भी खलबली पैदा होती है। क्योंकि पार्टी के लोग दल बदलकर आए नेताओं को प्रमुख पदो की जिम्मेदारी देते है। जिससे वर्षों से अपनी पार्टी के लिए ईमानदारी से राजनीति कर रहे सैकड़ों कार्यकर्ताओं का हक मारा जाता है जिससे उनके अंदर भी असंतोष का भाव पैदा होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है मध्य प्रदेश और बंगाल। मप्र में एक तरफ जहां शिवराज सरकार सिंधिया समर्थक मंत्रियों लोगों को प्रमुख पदो पर बैठाने के लिए आतुर है। वहीं, बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए शुभेंदु अधिकारी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया। ऐसे में कई भाजपा कार्यकर्ताओं पर अंसतोष देखा जा रहा है जिसका परिणाम आने वाले समय में पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर जनता के भरोसे और उनके पैसो पर राजनीतिक डांस फ्लोर पर नाचने वाले इन नेताओं की इस पनपती परंपरा के पंख यही कतर देना ही एक मात्र रास्ता है, नहीं तो आने वाले समय में यह परंपरा अन्य दूसरे राज्यों में भी फैलती दिखाई दे सकती है।

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