साहित्य का सोपान

बेचारी नारियां…

बेचारी नारियां…

मुझे बहुत बेचारी लगती हैं
नारी ‘मन’ की थाह लेने में जुटी
नारी ‘तन’ को उधेड़ कर रख देने वाली
बेचारी नारियां..

‘स्त्रीवाद’ में उलझकर
‘लिव-इन रिलेशनशिप’ को
प्रचारित-प्रसारित करने में जुटी
बेचारी नारियां..

सार्थक मुद्दों की तलाश में
भटकते हुए परिचर्चा में
‘निरर्थक’ बातों पर ठहाके लगाती
बेचारी नारियां

जीवन में आगे ‘बढ़ने’ की हौड़ में
अपने पहरावे को कम कर
‘आदमयुग’ तक पहुंचाती
बेचारी नारियां

नारी ‘अस्मिता’ की बातें करती
नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज़ जैसी
‘वाहियात’ बातों की गहराई में जाती
बेचारी नारियां

पुरुषों से बराबरी से जुड़े ‘आर्थिक’
और ‘सामाजिक’ सवालों से हटकर
सिर्फ ‘जिस्मानी’ रिश्तों की गाथा दोहराती
बेचारी नारियां

और ‘बेचारगी’ की हद तक पहुंच
सोशल मीडिया पर मिली फैन
फालोवर्स की भीड़ से खुद को बचाती
बेचारी नारियां

अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस;
हाथों में मोमबत्तियां लेकर
आधी रात को सड़कों पर उतर
रोड शो से लेकर ए सी वाले कमरों में
ज्वलंत मुद्दों को भुनाते हुए;
अपनी इमेज को माॅड दिखाने की
आपसी प्रतिस्पर्धा में उलझी
ये नारियां वाकई बहुत मासूम हैं

क्योंकि बौद्धिक स्तर पर इनका लेवल
आपको अचंभित करने में समर्थ है
पर अपने ही खोखले आदर्शवाद
के खोल में सिमटी हुई, शोहरत की
बुलंदियों को छूने की जिद्द में
जब ये खुद के बनाए मकड़जाल
में फंसकर घर परिवार की अहमियत
को दरकिनार कर देती हैं..

तब कहीं
टूटते बिखरते हुए खुद को संभाल
पाने में ही असमर्थ हो ‘इंडेपेंडेट’
होने का स्वांग रचते हुए
भीतर ही भीतर जलती कुढ़ते
क्लबों और नशों में खुद को डुबो
जीवन के कई दशक बिता देती हैं..

पता नहीं
कब, कितनी देर तक अपनी
कुंठाओं को यूँ भुनाती रहेंगी?
काश! स्वयं को ऐसे अनर्गल बातों से
अलग रख समाज की बेहतरी के लिए
थोड़ा सा सार्थक प्रयास कर पाएं
तो शायद अपने ऊपर लगे इस
ठप्पे से निजात पा जाएंगी ये
‘बेचारी’ नारियां..

सीमा भाटिया, लुधियाना, पंजाब

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