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नारी पनपती है तुलसी सी

नारी पनपती है तुलसी सी

बहती बयार के ख़िलाफ़
चलने वाली वामा
अपनों की एक आह पर
खुशी खुशी पिघल जाती है।

हर मोर्चे पर बेख़ौफ़ लड़ने वाली
परिवार के आगे मौन की मार
सहते हलक तक आए
शब्द निगल जाती है।

भले दिल में कसक पलती हो
अपनों को आहत नहीं करती
मुस्कुराते प्रेम के पुष्प
उगल जाती है।

तो क्या हुआ कि
आसमान उसका असीम
और ख़्वाब सुनहरे है
बच्चों की जरूरत पर अपने सपने
कुर्बान कर सुलग जाती है।

ज़िंदगी के हर राग को
बखूबी समझने वाली
सरताज की खुशीयों के आगे
अपने मन की तान और
दिल से उठते सुर बदल जाती है।

संघर्षों से टकराती सहती है
हर मार झुकी रीढ़ लिए
हंसती नारी सहनशीलता के
प्रतीक सी हर ज़ख्म से
आख़िर उभर जाती है।

आसान नहीं सफ़र
बचपन से पचपन तक का
हंसती खेलती यौवना बालों में
चाँदी भरते दो कूलों पर
खुद को फ़ना कर जाती है।

ना आसमान उसका
ना ज़मीन उसकी
हर साँचे में ढलने वाली को
बो दीजिए किसी भी मिट्टी में
तुलसी सी पनप जाती है।

भावना ठाकर “भावु” , बेंगलुरू, कर्नाटक

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