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किताब

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आज फिर तेरी याद खिलता हुआ गुलाब हुई जाती है।
अहसासे ज़िक्र की डायरी आफ़ताब हुई जाती है।

फिर फिर से गुज़र रहा वही हसीं ज़माना इन लम्हों में,
मुलाकाते अब्सार की चमक महताब हुई जाती है।

हम हमीं न रहे पहली नज़र के दीदार ए मुसरत में,
जाने क्यों विसाले आरज़ू बेनक़ाब हुई जाती है।

कई दफ़ा पूछा तूने कितनी चाहत है कहो मुझसे,
तेरे सवाल का मेरी साँसें ही जवाब हुई जाती है।

करती रही मैं भी दिल ही दिल में मोहब्बत बेशुमार,
इज़हार ए इश्क़ की तामीर नायाब हुई जाती है।

ए-तिराफ़-ए मोहब्बत में विपुला खूब शायरा हुई,
इश्क़ ए तसलीम में कामयाब किताब हुई जाती है।
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डॉ. अनिता जैन ‘विपुला’
उदयपुर

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