साहित्य का सोपान

अगर तुम मिल गए

अगर तुम मिल गए

सोचती हूँ कभी-कभी
जो मिल गये किसी मोड़ पर अचानक से कभी तुम तो
क्या करूंगी मैं

क्या रच पाऊँगी कोई कविता उस वक्त मैं
क्या भेंट कर पाऊँगी वो सारे शब्द तुम्हें
जो लिखती हूँ मैं सिर्फ तुम्हारे लिए
तुम्हारे अचानक सामने आ जाने से
पत्थर हो चुके अपने पैरों को क्या हिला भी पाऊँगी मैं
और अगर आ भी पायी होश में तो
क्या अपने कांपते हाथों से मैं छु पाऊँगी तुम्हें
ताकि कर सकूं यकीन कि सच में तुम सामने हो या
फिर मैं फिर से देख रही हूँ कोई सपना
क्या थरथराते पैरों से आ पाऊँगी मैं पास तुम्हारे
पूछने कि कैसे हो तुम
क्या याद आती है मेरी
क्या ख्बाबो में आती हूं मैं तुम्हारे
जैसे तुम आते हो ख्वाबों में मेरे

क्या उठा पाऊँगी झुकी पलकों को अपनी
क्या बेकाबु हो चुकी अपनी धड़कनों को
कर पाऊँगी काबू

क्या कह पाऊँगी हक से तुम्हें कि चलो पिलाओ
एक कप अदरक वाली चाय
ताकि इसी बहाने से मैं कुछ समय बिता पाऊँ संग तुम्हारे
और कर सकूं ढ़ेर सारी बातें तुमसे
और भर सकूं अपनी आखों में तुम्हें

नहीं जानती क्या करूंगी
जो अचानक से मिल गये तुम मुझे किसी मोड़ पर तो

पर इतना जानती हूँ कि
तुम्हारी बस एक झलक मुझे उतना ही देगी सुकून
जितना किसी छोटे बच्चे को मिलता है उसका मनपसंद खिलौना और मां की गोद से

सुनो ,
मुझे तुम तो न मिल पाये
पर मिलना कभी किसी मोड़ पर अचानक से किसी दिन
क्योंकि मरने से पहले देखना चाहती हूँ मैं तुम्हें जी भर कर
ताकि सुकून से मर सकूं मैं !!

रूबी प्रसाद
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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