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देर से क्यों उठती भारत की ट्यूब लाइट ?

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हम ठीक से देख पाते नहीं और परदे से मंज़र बदल जाता है…
भारत की ट्यूब लाईट देर से क्यों उठती है ?

राजेश शर्मा

आजादी के बाद से ही अक्सर देखने में आता है कि संवेदनशील मुद्दों पर भारत की ट्यूब लाईट अक्सर दे से उठती है ऐसा क्यों ? क्या राड(सत्ता),स्टार्टर(विपक्ष),चोक(जनता) तीनों में ही खराबी है। सामान्य तौर पर माना जाता है कि ट्यूब लाईट देर से उठने के पीछे बढ़ा कारण राड और स्टार्टर ही होते हैं क्योंकि चोक (जनता) तो पांच वर्ष में एक बार अपना काम करके रोशनी का जिम्मा राड (सत्ता) और स्टार्टर (विपक्ष) पर सौप देती है।

कोरोना की दूसरी लहर ने भारतवासियों के अरमानों को मझधार में लाकर खड़ा कर दिया है। दवा,इंजेक्शन,वैक्सीन,बेड,डाक्टर्स,स्टाफ,वेंटीलेटर,सीटीस्केन आदि सभी का टोंटा भारत की अंदरुनी व्यवस्था पर लगा वह बदनुमा दाग है जिसे साफ होने मे कई दशक लग जाएंगे। नदियों में तैरते शवों के दृश्य क्या भुला पाएंगे ? श्मशान मे दाह संस्कार के लिए लगी शवों की लम्बी कतारों के नज़ारे सपने में भी डराते हैं। अनाथ हुए बच्चे , नाती-पोतों की कोरोना बलि क्या बुजुर्गों का बुढ़ापा चेन से गुजारने देगी।

हम अमेरिका से सबक लें जिसने कोरोना को दूध में से मक्खी की तरह निकालकर नहीं फैंका बल्कि वे पात्र ही लुढ़का दिए जिसमें कोरोना रुपी मक्खी तैर रही थी। अमेरिका कोरोना की दूसरी लहर को भांप चुका था,उसने निपटने के पुख्ता इंतजामात कर रखे थे जिसका नतीजा वर्तमान मे समूचे विश्व के समक्ष है। दूसरी तरफ भारत राजनीति के दलदल में गोते लगाता रहा। चुनावों की चिल्लापौह में तैयारी और समझ की आवाज़ दबकर रह गई।हम वायरस का बर्ताव तक नहीं जान पाए। भारत ने अब जाकर एक टास्क फोर्स गठित किया है। इससे क्या गुल खिलेगा ? अभी कहना मुश्किल है। युरोपीय देशों की तुलना में हमारा हैल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद लचर है। भारत गांवों में बसता है और कोरोना की दूसरी लहर ने गांवों में भी प्रवेश किया जो चिंतनीय है।
कोरोना की दूसरी लहर का असर गावों तक पहुंचेगा, इसबात का भी अनुमान सरकार नहीं लगा पाई। जब स्थिति सामने आई तो वायरस से बचाव के साधन नाकाफी साबित हो रहे हैं। जानकारियाँ तो यहां तक मिल रही कि कोरोना पर काबू के प्रचार-प्रसार को लेकर आंकड़ों के बाजीगरी का खेल शुरु हो गया है जबकि हकीकत यह कि कोरोना पॉजिटिव का ग्राफ जमीनी स्तर पर बढ़ता ही नज़र आ रहा है।
सुकरात की एक सुप्रसिद्ध उक्ति है – “अन एग्जामिंड लाइफ इज नाट बर्थ लिविंग” अर्थात “अपरिक्षित जीवन जीने लायक नहीं है। परीक्षण किया जाना जरुरी है। जीवन विकास की प्रक्रिया है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि देश को चुनावों में ही उलझाया रखा जाए। आने वाले संकटों को नज़र अंदाज किया जाता रहे। दवाओं की कालाबाजारी व्यवस्था के मूंह पर कालिख है। जिनकी जान आर्थिक चोट खाकर भी नही बच सकी उनके परिजनों से पूछिए कि उनका हाल क्या है !! आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य तो यह है कि जान हथेली पर रख कोरोना मरीज़ों का इलाज़ करने वाले डाक्टर तक उपेक्षा और असुविधा का शिकार हो रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर में अबतक 420 डाक्टर अपनी जान गवां चुके हैं यह आंकड़ा इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने जारी किया है। खासबात यह है कि कई मृतक डाक्टर तो वैक्सीन के दोनों डोज लगवा चुके थे। सबसे बढ़ी बात तो यह कि कुछ डाक्टर्स को तो आवश्यकता पड़ने पर वेंटीलेटर तक उपलब्ध नहीं हो सके, तो आसानी से समझा जा सकता है कि आम संक्रमितों की हालत क्या हो रही होगी। कोरोना के साथ अब ब्लैक फंगस का चैलेंज स्वीकार करना होगा लेकिन उसकी भी कोई तैयारी नहीं, सिर्फ़ आधिकारिक स्तर पर मीटिंग आयोजित कर आवश्यक दिशा-निर्देश ही जारी किए जा रहे हैं। जबतक यह बिमारी भी भयावह रुप धारण नहीं कर लेगी तबतक भारत की ट्यूब लाइट इस विषय में भी जल्दी उठती दिखाई नहीं दे रही।

लेखक-   एमपी मीडिया पॉइंट के प्रधान संपादक हैं।

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