साहित्य का सोपान

फागुन की तरूणाई

महकी

फागुन की तरुणाई
सज धज कर
निकला ऋतुराज

हाथ फेर कर
सब पत्तों पर
हवा बजाये
रुनझुन साज——-

टहनी टहनी
पुलकित होकर
छोड़े पीत
वसन मोह पाश
नव पल्लव
हुलसे हुमकें
शाखाओं में
है उल्लास——-

ड़ाल-ड़ाल पर
यौंवन झलका
कोयल कूके
खोले राज

मदहोशी में
बहीं हवायें
कलियाँ छेड़ें
अभिनव राग
नये सृजन की
मधुबेला में
हरिअर पत्ते
गाते फाग——

कुसुम कुमुदनी
सोंहर गाये
नाचे झूमें
बसंत राज—-!!!

त्रिलोचना कौर, लखनऊ, उप्र

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