साहित्य का सोपान

तेरे_जाने_के_बाद_

तेरे_जाने_के_बाद_

इन टेसू के फूलों में यह,
मेरी ही दुःखाग्नि जल रही।
दूर क्षितिज-रेखाओं पर यह,
मेरी ही विवशता फल रही।

मेरी ही सकरुण आहों से,
बोझिल वातावरण बना है।
मेरे ही नैराश्य- तिमिर का,
यह नभ-नील वितान तना है।

मेरे ही उमड़ते ऑंसुओं,
के ये झरने फूट चले हैं।
मेरी ही देहस्त जलन से,
ये तारों के दीप जलें हैं।

इन उजली राहों में मेरा-
जगा हुआ है विरहोन्माद।
हॅंसी लुट गयी रोदन से ही,
अब “तेरे जाने के बाद” ।

योगेश नवानी
[ ऋषिकेश -जिला देहरादून, उत्तराखंड

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