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ॐ नमः शिवाय…..

ॐ नमः शिवाय…..

भोर का सूरज प्राची से उदित होने के लिए अपनी लालिमा बिखेर रहा …… पक्षियों का कलरव … मंदिरों की घंटियों की सुमधुर ध्वनि… वातावरण में गुंजायमान होता भूत भावन भगवान आशुतोष का … पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय…. । मन को निष्क्रिय करता… शरीर की सक्रिय करता…. । स्थान बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल…. ओम्कारेश्वर की पवित्र धरा…. मां नर्मदा के किनारे…..।

यहाँ पर नर्मदा नदी ….. पहाड़ी के चारों ओर नदी के बहने से “ॐ” का आकार बनता है…. । ॐ शब्द की उत्पति….. सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के मुख से हुई …. यही वजह है कि किसी भी धार्मिक शास्त्र …. या वेदों के मंत्र के उच्चारण से पहले… ॐ का उच्चारण किया जाता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ॐ का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से पुकारा जाता है….. लेकिन मां की परिक्रमा करते समय….. नदी को पार नहीं करने …. अथवा उल्लंघन नहीं करने की निर्धारित मर्यादा का पालन करना आवश्यक रहा…. तो ओम्कारेश्वर के दर्शन की अभिलाषा .. दिल में दफन कर देना उचित रहा…..। लेकिम ममलेश्वर महादेव के दर्शन का मार्ग प्रशस्त रहा। दोनों ज्योतिर्लिंग दो स्वरूप होने की कथा पुराणों में इस प्रकार दी गई है- एक बार विन्ध्यपर्वत ने पार्थिव-अर्चना के साथ भगवान्‌ शिव की छः मास तक कठिन उपासना की। उनकी इस उपासना से प्रसन्न होकर भूतभावन शंकरजी वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने विन्ध्य को उनके मनोवांछित वर प्रदान किए। विन्ध्याचल की इस वर-प्राप्ति के अवसर पर वहाँ बहुत से ऋषिगण और मुनि भी पधारे। उनकी प्रार्थना पर शिवजी ने अपने ओंकारेश्वर नामक लिंग के दो भाग किए। एक का नाम ओंकारेश्वर और दूसरे का अमलेश्वर पड़ा। दोनों लिंगों का स्थान और मंदिर पृथक्‌ होते भी दोनों की सत्ता और स्वरूप एक ही माना गया है।

ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का सही नाम अमरेश्वर मंदिर है। यह मंदिर भी पञ्च मंजिला मंदिर है हर मंजिल पर शिवालय है |  इस मंदिर प्रांगण में छह मंदिर और भी हैं |पत्थर के बेहतरीन कम वाला यह मंदिर अब पुरातत्व के अधीन है | देवी अहिल्या बाई के समय से यहाँ शिव पार्थिव पूजन होता रहा है, २२ ब्राह्मण प्रतिदिन सवा लाख पार्थिव शिव लिंगों द्वारा ममलेश्वर महादेव का पूजन किया जाता था | इसका भुगतान ब्राह्मणों को दान पारिश्रमिक भुगतान होलकर राज्य द्वारा किया जाता था |वर्तमान में यह संख्या घटकर ११ और फिर ५ ब्राम्हणों तक सिमित हो गई है | मंदिर की दीवालो पर शिव महिम्न स्त्रोत्र शिलालेख के रूप में है जो की १०६३ AD से दिनांकित है | अब आगे की यात्रा पर नर्मदे हर…..

शैलेश तिवारी

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